गांवों में इतना कर्ज क्यों ले रहे हैं लोग….?

हम खुद को कितना भी “शेर” या “सूरमा” समझ लें, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आज का एक बड़ा वर्ग कर्ज में गर्दन तक डूबा हुआ है।

जमीन बैंक की है, मकान बैंक का, गाड़ी बैंक की और मोबाइल तक किस्तों पर है। फिर भी सीना तानकर घूमने का अहंकार कम नहीं होता। घर में राशन खत्म हो, बच्चों की स्कूल फीस बकाया हो, लेकिन दरवाजे पर चार पहिया गाड़ी खड़ी होनी चाहिए। चाहे पुश्तैनी जमीन बिक जाए या घर के जेवर गिरवी रखने पड़ें, लेकिन पड़ोसियों को “ठसका” दिखना चाहिए। यह दिखावा शान नहीं, आने वाली पीढ़ियों के साथ धोखा है।

दस-पंद्रह साल पहले गाँवों और कस्बों के लड़के सुबह-सुबह मैदानों में दौड़ते दिखते थे, सेना और पुलिस में भर्ती होने का जुनून था। आज युवा दिखते तो हैं, लेकिन दौड़ते हुए नहीं। अब तैयारी वर्दी की नहीं, बल्कि ईएमआई (EMI) चुकाने के जुगाड़ की होती है। दिमाग में पढ़ाई और हुनर के बजाय ‘दबंगई’ और ‘जुगाड़’ ने जगह ले ली है।

जो जमीन हमारी पहचान और आजीविका थी, उसे आज झूठी शान-शौकत की भेंट चढ़ा दिया गया है।

खेत बेचकर गाड़ी ली जा रही है।

कर्ज लेकर शादियां और उत्सव मनाए जा रहे हैं।

मृत्यु भोज और दिखावे के दान में मुकाबला चल रहा है।

किसने सबसे महंगा ‘भात’ भरा, किसने शादी में करोड़ों उड़ाए—यही चर्चा का विषय रह गया है। चाहे घर तबाह हो जाए, लेकिन समाज में नाम होना चाहिए। याद रखिए, यह नाम नहीं, बल्कि आर्थिक नालायकी है।

मंदिरों में लाखों का चढ़ावा और भंडारे करने में हम आगे हैं, चाहे वह पैसा उधार का ही क्यों न हो। भगवान भी सोचता होगा कि “पहले अपने बच्चों का भविष्य तो सुरक्षित कर ले।” श्रद्धा बुरी नहीं है, लेकिन कर्ज लेकर किया गया प्रदर्शन सिर्फ मूर्खता है।

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