जबलपुर: ₹2.70 लाख किलो वाले ‘मियाजाकी’ आम की सुरक्षा में 20 खूंखार कुत्ते तैनात

जबलपुर के संकल्प परिहार के बागान में पक रहे हैं दुनिया के सबसे महंगे 'मियाजाकी' आम। 20 शिकारी कुत्तों और CCTV के पहरे में पल रहे ₹2.70 लाख किलो वाले 'सूर्य के अंडे'।

मध्य प्रदेश के जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर चरगवां रोड पर हिनौता गांव है. यहां का ‘श्री महाकालेश्वर हाइब्रिड फार्महाउस’ इन दिनों देश-दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. इस बागान के मालिक संकल्प परिहार ने अपनी पत्नी रानी सिंह के साथ मिलकर मेहनत से एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया है, जहां फलों की कीमत आसमान छूती है. यहां सुरक्षा का आलम यह है कि बागान के चारों ओर 20 विदेशी नस्ल के खूंखार कुत्ते जर्मन शेफर्ड तैनात हैं. इसके साथ ही चप्पे-चप्पे पर 15 से ज्यादा CCTV कैमरे लगे हैं, जो 24 घंटे हर हलचल को रिकॉर्ड करते हैं. सुरक्षा गार्ड्स की एक टीम लगातार पेट्रोलिंग करती है. यह सब इंतजाम इसलिए किए गए हैं, ताकि कोई इन बेशकीमती आमों को नुकसान न पहुंचा सके.

इस बागान की सबसे चर्चित और महंगी किस्म है ‘मियाजाकी’ आम, जो मूल रूप से जापान के मियाजाकी प्रांत में पाया जाता है. इस आम को ‘एग ऑफ सन’ सूर्य का अंडा भी कहा जाता है. इस आम की अंतरराष्ट्रीय कीमत 2 लाख 70 हजार रुपए प्रति किलो तक है. यह आम पकने के बाद गहरा लाल और बैंगनी हो जाता है. इसका वजन 350 ग्राम तक होता है और इसमें शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है, जो कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में सहायक मानी जाती है. जबलपुर के इस बागान में आने वाले पर्यटक कहते हैं कि, ‘भैया इस आम को खाने के लिए तो बैंक से पर्सनल लोन के लिए अप्लाई करना पड़ेगा”.

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फार्महाउस में 50 किस्म के आम उगाए जा रहे

संकल्प सिंह परिहार के इस 4 एकड़ के फार्महाउस में आम की खेती एक अनोखे प्रयोग की तरह सामने आई है, जहां सिर्फ जापान का चर्चित मियाजाकी ही नहीं बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों से लाई गई 50 से ज्यादा किस्में उगाई जा रही हैं, जिनमें अफगानिस्तान का भारी-भरकम ‘नूरजहां’, जो 5 किलो तक होता है. चीन की सफेद और लंबी आइवरी, अमेरिका का पूरी तरह काला दिखने वाला ब्लैक मैंगो और खुशबूदार सेंसेशन, नेपाल का मशहूर केसर बादाम और मलेशिया का बड़ा जंबो ग्रीन शामिल है. वहीं इन विदेशी प्रजातियों के साथ भारत की पारंपरिक और लोकप्रिय किस्में जैसे- मलिका, आम्रपाली, दशहरी, लंगड़ा और चौसा भी इस फार्म में हैं.

20 डॉग 24 घंटे देते हैं पहरेदारी

इतनी सख्त सुरक्षा के पीछे एक पुरानी टीस छिपी है. पिछले साल इस बागान में चोरी की एक बड़ी वारदात हुई थी. चोरों ने लाखों के आम चुरा लिए थे. उस दौरान संकल्प के वफादार कुत्तों ने चोरों का पीछा किया था, जिसमें एक फीमेल डॉग जैरी बुरी तरह घायल हो गई थी. इस घटना के बाद संकल्प ने ठान लिया कि वे अपनी फसल को किसी भी कीमत पर आंच नहीं आने देंगे. अब यहां 17 विदेशी और 3 देसी कुत्ते चौबीसों घंटे पहरेदारी करते हैं.

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पॉली बैग में पैक रहते हैं आम

संकल्प सिंह परिहार केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि फलों की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देते हैं. हर आम को कीड़ों और पक्षियों से बचाने के लिए ‘पॉली बैग’ (ग्रो बैग) में पैक किया गया है. वहीं चिलचिलाती धूप और लू से बचाने के लिए बागान में ग्रीन नेट और कवर का इस्तेमाल किया गया है. यहां किसी भी तरह के जहरीले कीटनाशक का उपयोग नहीं होता. पूरे बागान में ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे आम का स्वाद प्राकृतिक बना रहता है.

दूर-दूर से लोग इस ‘अजूबे’ बागान को देखने पहुंच रहे हैं. विजिटर विक्की साहू का कहना है, “हमने सुना था कि यहां लाखों के आम हैं, आज देख भी लिए. इन्हें देखकर खाने की इच्छा तो बहुत होती है, लेकिन इनकी कीमत सुनकर लगता है कि इन्हें चखने के लिए भी फाइनेंस करवाना पड़ेगा.” बागान में जगह-जगह साइन बोर्ड लगे हैं, जिन पर लिखा है कि आमों को हाथ न लगाएं. यह चेतावनी केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उन अनमोल फलों की गरिमा बनाए रखने के लिए भी है.

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‘मिजाजाकी’ आम को भारतीय मिट्टी पर उगाया

जबलपुर का यह बागान भारतीय कृषि की बदलती तस्वीर को दर्शाता है. संकल्प परिहार ने यह साबित कर दिया है कि अगर पारंपरिक खेती में तकनीक, सुरक्षा और विदेशी किस्मों का समावेश किया जाए तो किसान भी लाखों का टर्नओवर हासिल कर सकता है. मियाजाकी जैसे आम को भारत की मिट्टी में उगाना अपने आप में एक उपलब्धि है. हालांकि आम आदमी के लिए ये फल अभी भी ‘सपना’ ही है, लेकिन संकल्प परिहार की यह पहल भविष्य में भारत को ‘दुनिया का मैंगो हब’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

अगली बार जब आप आम खरीदें तो याद रखिएगा कि जबलपुर में कुछ ऐसे आम भी पक रहे हैं, जिनकी कीमत में एक छोटी कार आ सकती है. 20 शिकारी कुत्तों के पहरे में पल रहे ये आम केवल फल नहीं, बल्कि एक किसान के जुनून और कड़ी मेहनत का परिणाम हैं. भले ही इन्हें खाने के लिए लोन लेना पड़े, लेकिन इनकी चमक आज पूरी दुनिया में जबलपुर का नाम रोशन कर रही है.

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