अयोध्या: यश पेपर मिल के प्रदूषण से ग्रामीण बेहाल, सरयू नदी पर भी मंडराया खतरा
अयोध्या की यश पेपर मिल पर दूषित पानी और काली राख फैलाने का आरोप। ग्रामीणों में कैंसर का डर और सरयू नदी के प्रदूषित होने की आशंका। जानें क्या है पूरा मामला।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में स्थित यश पेपर मिल एक बार फिर विवादों में है. राम मंदिर से करीब 5 किलोमीटर दूरी पर बसे कई गांवों के लोगों ने आरोप लगाया है कि फैक्ट्री से निकलने वाला दूषित पानी और चिमनी से उठने वाली काली राख उनके जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है. ग्रामीणों का दावा है कि इस प्रदूषण के कारण लोग बीमार हो रहे हैं और कई मामलों में मौतें भी हुई हैं.
क्या हैं ग्रामीणों के आरोप?
- फैक्ट्री से निकलने वाला दूषित पानी नालों के जरिए गांवों और खेतों तक पहुंच रहा है.
- गांव में लगे हैंडपंप और नलों का पानी पीला और बदबूदार हो गया है.
- गर्मी के मौसम में लोग घरों की छत या बाहर सो नहीं पाते, क्योंकि हवा में काली राख घुली रहती है.
- पशुओं की मौत और फसलों के नुकसान के भी आरोप लगाए गए हैं.
- कई ग्रामीणों ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का दावा किया है.
- ग्रामीणों का यह भी कहना है कि फैक्ट्री रात के समय चोरी-छिपे दूषित पानी छोड़ती है.
सरयू नदी को भी खतरा?
स्थानीय लोगों का दावा है कि यह दूषित पानी नालों के जरिए पवित्र सरयू नदी तक पहुंच रहा है, जिससे नदी का जल भी प्रदूषित हो रहा है. हर दिन हजारों श्रद्धालु और साधु-संत सरयू में स्नान करते हैं. ऐसे में यह मामला स्वास्थ्य और आस्था दोनों से जुड़ा हुआ है.
प्रशासन और अधिकारियों की प्रतिक्रिया
मामले पर जिलाधिकारी ने जांच का आश्वासन दिया है. वहीं मंडल आयुक्त ने भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को मौके पर भेजकर जांच कराने की बात कही है. हालांकि, जब क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी आर. वी. सिंह से संपर्क किया गया तो उन्होंने आधिकारिक बयान देने से इनकार करते हुए कहा कि वे इस विषय में बोलने के लिए अधिकृत नहीं हैं.
कंपनी का पक्ष
यश पेपर मिल के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की. फोन पर अधिकारियों ने बाद में विस्तृत जानकारी देने की बात कही, लेकिन कई घंटे बीत जाने के बाद भी कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई.
विरोध और आंदोलन
इस मुद्दे को लेकर किसान यूनियन और कई सामाजिक संगठनों ने धरना-प्रदर्शन भी किया है. इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि उनकी समस्या अब तक जस की तस बनी हुई है. यह मामला न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है. अब सभी की नजर प्रशासनिक जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी है. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला बड़े स्तर पर कानूनी और पर्यावरणीय कार्रवाई की मांग कर सकता है.