बेटे को किडनी देने वाले शिक्षक को राहत, हाईकोर्ट ने 6% ब्याज के साथ भुगतान का दिया आदेश

हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को बेटे को किडनी देने वाले शिक्षक के 7.45 लाख रुपये के मेडिकल क्लेम को 6% ब्याज संग चुकाने का आदेश दिया।

चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में हरियाणा सरकार को अपने गंभीर रूप से बीमार बेटे को किडनी देने वाले शिक्षक पिता के मेडिकल खर्च का तत्काल भुगतान करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने आश्रित परिजन के इलाज में खर्च की गई राशि की प्रतिपूर्ति केवल इसलिए अनिश्चितकाल तक नहीं रोकी जा सकती कि विभाग और अस्पताल के बीच बिल की राशि को लेकर विवाद चल रहा है। हाईकोर्ट ने संबंधित शिक्षक को 7,45,915 रुपये की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने का निर्देश दिया है। मामले में खास बात यह रही कि शिक्षक ने अपने बेटे की जान बचाने के लिए स्वयं किडनी दान की, लेकिन इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति पाने के लिए उसे करीब दो साल तक सरकारी प्रक्रिया का इंतजार करना पड़ा। जब विभागीय स्तर पर समाधान नहीं हुआ तो उसे न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

अस्पताल के बिल पर विवाद बना भुगतान में सबसे बड़ी अड़चन
जस्टिस हरप्रीत सिंह बरार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान सामने आया कि याचिकाकर्ता हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग में टीजीटी सोशल स्टडीज के शिक्षक हैं। उनका बेटा क्रोनिक किडनी रोग और टाइप-1 डायबिटीज मेलिटस से पीड़ित था। चिकित्सकों की सलाह पर 27 सितंबर 2024 को उसका एक पैनल में शामिल अस्पताल में रीनल ट्रांसप्लांट किया गया। इस कठिन समय में पिता स्वयं बेटे के किडनी डोनर बने। बेटा 26 सितंबर से 5 अक्टूबर 2024 तक अस्पताल में भर्ती रहा। अस्पताल की ओर से उपचार का कुल बिल 7,46,915 रुपये तैयार किया गया। शिक्षक ने नवंबर 2024 में मेडिकल रिइम्बर्समेंट के लिए जरूरी दस्तावेजों के साथ अपना दावा विभाग के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि उनका बेटा पूरी तरह उन पर निर्भर था। वह अविवाहित था और उसकी अपनी कोई आय नहीं थी। ऐसे में मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए निर्धारित औपचारिकताओं को भी पूरा कर दिया गया था।

विभागीय जांच में अस्पताल पर नियमों के उल्लंघन का आरोप
मामला तब उलझ गया जब राज्य के संबंधित अधिकारियों ने अस्पताल के बिल की जांच शुरू की। जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि पैनल में शामिल अस्पताल ने स्वास्थ्य विभाग की 14 जुलाई 2020 को जारी नीति एवं निर्देशों के विपरीत कुछ राशि वसूल की थी।

इसके बाद 2 जून 2025 को संबंधित प्राधिकरण ने अस्पताल को बिल में सुधार करने तथा निर्धारित सीमा से अधिक वसूली गई राशि वापस करने का निर्देश दिया। विभाग की ओर से इसी विवाद को मेडिकल क्लेम के भुगतान में देरी का आधार बनाया गया।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस रवैये को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने साफ किया कि अस्पताल और सरकार के बीच बिल की शुद्धता या पैकेज रेट को लेकर विवाद का खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतना पड़ सकता।

‘कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक परेशान नहीं किया जा सकता’
जस्टिस हरप्रीत सिंह बरार ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यदि कर्मचारी ने मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं तो अस्पताल और विभाग के बीच वित्तीय विवाद को आधार बनाकर उसके भुगतान को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता। अदालत ने माना कि इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपने स्तर पर सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कर दी थीं। उसने न केवल बेटे के इलाज का खर्च उठाया बल्कि स्वयं किडनी दान कर बेटे का जीवन बचाने की कोशिश की। ऐसे में मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए उसे वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। पीठ ने राज्य के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा व्यवहार निष्पक्षता और तर्कसंगतता के मानदंडों पर खरा नहीं उतरता। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित मौलिक अधिकारों के संदर्भ में भी गंभीरता से लिया।

छह प्रतिशत ब्याज के साथ होगा भुगतान
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 7,45,915 रुपये की राशि का भुगतान किया जाए। इसके साथ छह प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। अदालत का यह आदेश केवल बकाया मेडिकल राशि के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यह संदेश भी है कि सरकारी कर्मचारियों के वैध मेडिकल दावों को विभागीय विवादों की आड़ में लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने भुगतान के मामले में तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, ताकि शिक्षक को और आर्थिक एवं मानसिक परेशानी का सामना न करना पड़े।

पैकेज रेट पर हाईकोर्ट पहले भी दे चुका है निर्देश
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह भी आया कि इसी तरह के मामलों में अस्पतालों द्वारा निर्धारित पैकेज रेट से अधिक राशि वसूलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। जस्टिस बरार ने इस संदर्भ में ‘हुकम सिंह केस’ में पहले जारी किए गए निर्देशों का उल्लेख किया।

हाईकोर्ट पहले ही हरियाणा के डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज को निर्देश दे चुका है कि पैनल में शामिल अस्पतालों द्वारा वसूले जा रहे पैकेज रेट की जांच की जाए। यदि कोई अस्पताल सरकार की निर्धारित मेडिकल पॉलिसी का उल्लंघन करता है या तय दरों से अधिक राशि वसूलता है तो उसके खिलाफ उचित और सख्त कार्रवाई की जाए।

दो सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने का आदेश
इस मामले में अदालत ने केवल शिक्षक को मेडिकल खर्च दिलाने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर भी जवाबदेही तय की है। जस्टिस बरार ने संबंधित प्रतिवादी को दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

हलफनामे में यह बताना होगा कि ‘हुकम सिंह केस’ में हाईकोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होगा कि सरकार ने पैनल अस्पतालों की ओर से पैकेज रेट के कथित उल्लंघन को रोकने के लिए किस स्तर पर कार्रवाई की है।

मेडिकल क्लेम के मामलों में बढ़ेगी जवाबदेही
हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक शिक्षक और उसके परिवार के मेडिकल खर्च तक सीमित नहीं माना जा रहा। आदेश से सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रितों के मेडिकल क्लेम से जुड़े मामलों में विभागीय जवाबदेही का मुद्दा भी सामने आया है। मेडिकल इमरजेंसी के दौरान परिवार पहले ही भारी आर्थिक और मानसिक दबाव से गुजरता है। यदि इलाज के बाद प्रतिपूर्ति का दावा महीनों या वर्षों तक लंबित रहता है तो कर्मचारी पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। खासतौर पर ऐसे मामलों में जहां इलाज गंभीर बीमारी और अंग प्रत्यारोपण जैसी जटिल चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़ा हो, वहां समय पर भुगतान का महत्व और बढ़ जाता है।

अस्पताल और विभाग के विवाद से अलग रखा जाए कर्मचारी का दावा
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अस्पताल और सरकार के बीच वित्तीय विवाद को कर्मचारी के वैध मेडिकल क्लेम के भुगतान से अलग रखा जाना चाहिए। यदि किसी अस्पताल ने निर्धारित पैकेज रेट से अधिक राशि वसूल की है तो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है और अतिरिक्त राशि की वसूली भी कर सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया के कारण उस कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक भुगतान से वंचित नहीं किया जा सकता जिसने इलाज के लिए वास्तविक खर्च वहन किया है।

हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए शिक्षक के पक्ष में आदेश पारित किया है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी। उस समय राज्य सरकार को यह भी बताना होगा कि ‘हुकम सिंह केस’ में दिए गए निर्देशों के अनुपालन के लिए उसने क्या ठोस कदम उठाए हैं।

इस तरह बेटे की जिंदगी बचाने के लिए किडनी दान करने वाले शिक्षक पिता की करीब दो वर्ष लंबी मेडिकल प्रतिपूर्ति की लड़ाई में हाईकोर्ट का आदेश राहत लेकर आया है। साथ ही अदालत ने सरकार को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि नीतियों और विभागीय जांच की प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक अपना वैध भुगतान रोककर नहीं चुकानी पड़ सकती।

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