‘बयान को घुमा-फिराकर पेश किया’, दीपेंद्र हुड्डा ने विवाद पर जताई संवेदना और दी सफाई
दीपेंद्र हुड्डा ने हालिया बयान विवाद पर दी सफाई। कहा- सिख समाज से परिवार जैसा रिश्ता, बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया।
चंडीगढ़ : कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने हालिया बयान को लेकर उठे विवाद पर सफाई देते हुए कहा है कि पिछले दो दिनों से उनके बयान को घुमा-फिराकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनके बयान में अंग्रेजी का एक ऐसा शब्द भी जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसका उन्होंने इस्तेमाल ही नहीं किया था और न ही उनके बयान का ऐसा कोई अर्थ था। दीपेंद्र हुड्डा ने स्पष्ट किया कि उनकी मंशा किसी भी समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नहीं थी।
सिख समाज से भावनात्मक जुड़ाव का किया जिक्र
दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि सिख समाज उनके लिए अपना परिवार है और सिख समाज के किसी भाई को ठेस पहुंचाने की वह कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि यदि उनके बयान से किसी भाई की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह खेद प्रकट करते हैं। उनका उद्देश्य किसी का दिल दुखाना नहीं था।
उन्होंने कहा कि सिख समाज देश का गौरवशाली समाज है। देश की आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक देश के लिए सिख समाज ने जो कुर्बानियां दी हैं, उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। देश की सीमाओं की रक्षा हो या राष्ट्र के लिए कोई अन्य संघर्ष, सिख समाज का योगदान हमेशा प्रेरणादायी रहा है।
‘सिख समाज के साथ हमारा परिवार जैसा रिश्ता’
कांग्रेस सांसद ने कहा कि सिख समाज के साथ उनका रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि परिवार जैसा है। उन्होंने कहा कि जरूरत के समय छोटे-बड़े भाइयों की तरह दोनों समाज एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हैं। यही सामाजिक और भावनात्मक रिश्ता उनकी राजनीति और सार्वजनिक जीवन की भी महत्वपूर्ण आधारभूमि रहा है।
दीपेंद्र हुड्डा ने अपने परिवार और सिख समाज के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रिश्ता आज का नहीं है, बल्कि इसका इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन और किसान संघर्षों तक जाता है।
‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन और परिवार का इतिहास
उन्होंने वर्ष 1908 के पंजाब के ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह के साथ उनके परदादा चौधरी मातूराम को भी काले पानी की सजा हुई थी। हुड्डा ने इस ऐतिहासिक प्रसंग के जरिए यह बताने का प्रयास किया कि उनके परिवार और सिख समाज के बीच संघर्ष और सहयोग का रिश्ता लंबे समय से रहा है। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौर से लेकर वर्तमान समय तक दोनों समुदायों के बीच आपसी सहयोग और भाईचारे की परंपरा कायम रही है।
किसान आंदोलन का भी किया जिक्र
दीपेंद्र हुड्डा ने किसान आंदोलन को भी अपने बयान का महत्वपूर्ण संदर्भ बनाया। उन्होंने कहा कि जब पंजाब से किसान भाई आंदोलन के लिए आए थे, तो वह स्वयं सबसे पहले उनके साथ पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि संघर्ष चाहे कोई भी रहा हो, उन्होंने हमेशा किसानों और सिख समाज के साथ खड़े होने का प्रयास किया है।
उनका कहना था कि किसानों के मुद्दों और उनके अधिकारों की लड़ाई में उनका जुड़ाव केवल राजनीतिक नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इसे सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर भी देखा है। पंजाब से आए किसानों के साथ उनके खड़े होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपने पुराने संबंधों और राजनीतिक रुख को स्पष्ट करने की कोशिश की।
1984 के न्याय की लड़ाई में भी साथ होने का दावा
सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने वर्ष 1984 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि सिख समाज को न्याय मिलना चाहिए और न्याय की इस लड़ाई में वह उनके साथ हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई दोषी बचना नहीं चाहिए। इस बयान के जरिए हुड्डा ने एक ओर जहां अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब दिया, वहीं दूसरी ओर 1984 के पीड़ितों के प्रति अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता भी दोहराई। उन्होंने कहा कि सिख समाज के साथ न्याय होना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
विवाद के बीच सफाई से साधा भावनात्मक संतुलन
दीपेंद्र हुड्डा की सफाई ऐसे समय आई है जब उनके बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हुई। उन्होंने विवाद को राजनीतिक बहस का विषय बनाने के बजाय अपने शब्दों की व्याख्या करते हुए कहा कि उनके बयान को संदर्भ से अलग करके पेश किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उनके राजनीतिक संस्कार और व्यक्तिगत भावना का हिस्सा नहीं हो सकता। साथ ही, यदि उनके कथन से किसी की भावना आहत हुई है तो उन्होंने बिना शर्त खेद व्यक्त करते हुए संवाद का रास्ता खुला रखा।
‘हमेशा साथ खड़े रहे हैं और आगे भी रहेंगे’
अपने बयान के अंत में दीपेंद्र हुड्डा ने सिख समाज के प्रति सम्मान और भाईचारे की भावना दोहराई। उन्होंने कहा कि सिख समाज ने देश के लिए जो त्याग और बलिदान दिया है, उस पर पूरे देश को गर्व है। उन्होंने अपने परिवार के ऐतिहासिक संबंधों, किसान आंदोलन में सहभागिता और 1984 के न्याय की लड़ाई का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका रिश्ता सिख समाज के साथ परिवार जैसा है।
उन्होंने अंत में ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ कहकर अपनी बात समाप्त की। उनके इस बयान को मौजूदा विवाद के बीच एक राजनीतिक सफाई के साथ-साथ सिख समाज के प्रति सम्मान और सामाजिक भाईचारे का संदेश भी माना जा रहा है।