हरतालिका तीज व्रत कब है? जानिए माता पार्वती और भगवान शिव की अमर कथा और पूजा का महत्व
14 सितंबर को है हरतालिका तीज का पावन पर्व। जानिए अखंड सौभाग्य के इस व्रत की पौराणिक कथा और माता पार्वती की तपस्या।
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पावन पर्व बड़े भाव से मनाया जाता है. इस साल 14 सितंबर सोमवार के दिन सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य के लिए यह कठिन उपवास रखेंगी. इस पावन अवसर पर उस अमर कथा का ध्यान किया जाता है, जब देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अपना पूरा जीवन भक्ति में समर्पित कर दिया था. बाल्यकाल से ही उनके मन में केवल शिव जी का वास था. जब उनके पिता ने उनका विवाह किसी अन्य स्थान पर तय करना चाहा, तब देवी ने अपना घर छोड़ दिया. उन्होंने घने जंगल में जाकर जो कठिन मार्ग चुना, उसी की याद में यह पावन पर्व मनाया जाता है.
राजसी वैभव का त्याग और घने जंगल में साधना
भगवान शिव को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती ने महल के सभी सुख-सुविधाओं को एक पल में छोड़ दिया. वे घने जंगल की ओर चली गईं और वहां कठोर साधना शुरू कर दी. उन्होंने अन्न और जल का पूरी तरह त्याग कर दिया. शुरुआत में वे केवल गिरे हुए सूखे पत्तों को खाकर तप करती रहीं और फिर केवल हवा के सहारे टिक गईं. तपस्या का यह रूप इतना कठिन था कि तीनों लोकों में उनकी भक्ति की चर्चा होने लगी. बिना किसी शिकायत के उन्होंने भयंकर सर्दी, गर्मी और बरसात को सहन किया. उनका केवल एक ही लक्ष्य था कि किसी तरह भोलेनाथ उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें स्वीकार कर लें.
बालू का शिवलिंग और निश्चल भक्ति का भाव
जंगल के भीतर देवी पार्वती ने नदी किनारे की बालू यानी रेत से शिवलिंग का निर्माण किया. वे हर दिन उस बालू के शिवलिंग की पूजा करती थीं और शिव जी के मंत्रों का जाप करती थीं. जब उनके पिता उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे, तब भी देवी अपने इरादे पर पूरी तरह अड़ी रहीं. उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे केवल शिव जी को ही अपना पति मान चुकी हैं. सखियों के सहयोग से उन्होंने अपनी इस कठिन पूजा को बिना किसी बाधा के जारी रखा. हर दिन उनका ध्यान केवल भोलेनाथ पर ही लगा रहता था. बालू से बने उस शिवलिंग की सच्चे मन से की गई पूजा ने उनके भक्ति भाव को और अधिक मजबूत बना दिया था.
शिव जी का प्रकट होना और पावन वरदान मिलना
वर्षों की इस कठोर साधना और निश्चल भक्ति को देखकर आखिरकार भगवान शिव देवी पार्वती की इस अटूट निष्ठा से बेहद प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट हो गए. शिव जी ने देवी को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया और उनकी मनोकामना पूरी की. जिस पावन तिथि को शिव जी ने यह वरदान दिया, वही भाद्रपद शुक्ल तृतीया का दिन था. तभी से यह माना जाता है कि जो भी महिला इस दिन पूरे भाव से पूजा करती है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. देवी की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे मन से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता और उसका फल जरूर मिलता है.