शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित मां शाकंभरी देवी मंदिर, जहां लगता है हरी सब्जियों का अनोखा भोग

सहारनपुर के सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी मंदिर में नवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यहां माता को हरी शाक-सब्जियों का भोग लगाने की विशेष परंपरा है।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पहाड़ियों की मनोरम वादियों के बीच बसा सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर यहां सहारनपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान से लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए जुटने लगे हैं। इस सिद्धपीठ की सबसे अनूठी बात मां शाकंभरी देवी का स्वरूप है, जिन्हें अन्न, वनस्पति और जीवन का पोषण करने वाली देवी माना जाता है। जहां सामान्यतः मंदिरों में मिठाइयों और मेवों का प्रसाद चढ़ाया जाता है, वहीं यहां माता को हरी शाक-सब्जियों का भोग लगाने की विशेष परंपरा है, जो धरती को भीषण अकाल से उबारने की पौराणिक कथा की याद दिलाती है।

🚩 बाबा भूरादेव के दर्शन बिना अधूरी है यात्रा, जसमौर क्षेत्र की शिवालिक पर्वतमाला में स्थित है धाम

मां शाकंभरी देवी का यह ऐतिहासिक मंदिर सहारनपुर जिले की बेहट तहसील के जसमौर क्षेत्र में स्थित है, जो जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर है। मुख्य मंदिर से करीब 1 किलोमीटर पहले बाबा भूरादेव का मंदिर स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बाबा भूरादेव माता के रक्षक और क्षेत्रपाल हैं। मान्यता है कि जो श्रद्धालु मुख्य मंदिर में माता के दर्शन से पहले बाबा भूरादेव के दरबार में हाजिरी नहीं लगाते, उनकी यात्रा और पूजा अधूरी मानी जाती है तथा उन्हें माता का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता है।

📜 क्या है ‘शाकंभरी’ नाम के पीछे की पौराणिक कथा? कैसे हुआ था दैत्य दुर्गमासुर का वध

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में दुर्गमासुर नामक दैत्य के अत्याचारों के कारण पूरी पृथ्वी पर वर्षा रुक गई और भीषण अकाल व सूखा पड़ गया। अन्न और जल के अभाव में समस्त जीव-जंतु तड़पने लगे। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं और ऋषियों ने आदिशक्ति की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर प्रकट हुईं देवी ने अपनी शक्ति से पूरी धरती पर दिव्य शाक (हरी सब्जियां), फल और वनस्पतियां उत्पन्न कीं। शाक उत्पन्न कर संसार का भरण-पोषण करने के कारण माता का नाम ‘शाकंभरी’ पड़ा। इसके बाद माता ने महादैत्य दुर्गमासुर का संहार कर समस्त देवों और मनुष्यों को अभय प्रदान किया। चैत्र व शारदीय नवरात्र में यहां विशाल लक्खी मेले का आयोजन होता है, जिसमें पूरा क्षेत्र भक्तिमय बना रहता है।

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