Inspirational Story: पति की मौत, बेटे को निगल गया कैंसर; अब 2 पोतियों के लिए मजदूरी कर रहीं 68 साल की वीरवती

नोएडा की 68 साल की वीरवती से पहले पति का साथ छूटा, फिर कैंसर ने जवान बेटे को भी छीन लिया. इसके बाद वीरवती ने बहू की दूसरी शादी करवाई. साथ ही दो पोतियों की जिम्मेदारी भी खुद संभालती हैं.

यह कहानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नोएडा के बिलासपुर कस्बे की रहने वाली वीरवती की है, जिनके पति डालचंद 27 साल पहले घर से कमाने निकले लेकिन आज तक घर नहीं पहुंचे. पति के लापता होने की वजह से घर की सारी जिम्मेदारी बेटे सुधीर पर आ गई. वीरवती ने अपने बेटे और बेटी की शादी करवा दी. इसी के साथ वो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गईं. हालांकि, समय को कुछ और ही मंजूर था. वीरवती को एक दिन अचानक पता चला कि बेटे सुधीर को कैंसर है.

दरअसल, बेटे की तबियत खराब होने पर जांच करवाई गई, जिसमें डॉक्टर ने उन्हें कैंसर का मरीज बताया. बेटे के कैंसर का इलाज शुरू हुआ. इलाज में बहुत सारे पैसे लग रहे थे. मंहगी दवाइयों के कारण आर्थिक तंगी ने परिवार को घेर लिया. इस बीच आस-पास के लोगों ने वीरवती के परिवार को आर्थिक रूप से मदद की, लेकिन नसीब में कुछ और ही लिखा था. सुधीर की मौत हो गई और इस प्रकार कैंसर ने वीरवती से बेटे को छीन लिया.

बहू की कराई शादी

सुधीर अपने पीछे मां, पत्नी और दो बेटियों को छोड़ गया. अब घर की सारी जिम्मेदारी वीरवती के कंधों पर आ गई. वीरवती ने बड़ा दिल दिखाया और बहू के नए जीवन के बारे में सोचा. उन्होंने बहू की दूसरी शादी करवा दी. हालांकि, यहां भी उनके सामने मुसीबत का पहाड़ मुंह बाए खड़ा था. बहू के नए ससुराल वालों ने उसके दोनों बच्चों को अपनाने से इनकार कर दिया. पोतियों का चेहरा देखकर वीरवती ने कहा कि अब इन दोनों की जिम्मेदारी भी वही उठाएंगी.

दादी ने खोजी नौकरी

अब सवाल था कि दोनों पोतियों का पालन-पोषण कैसे किया जाए. इसके लिए हर महीने कुछ पैसों की जरूरत थी. इस जरूरत को पूरा करने के लिए दादी वीरवती ने वीरता के साथ एक और फैसला लिया कि अब वो काम के लिए बाहर निकलेंगी. इसके बाद बुढ़ापे वाली उम्र में वीरवती ने ग्रेटर नोएडा की फैक्ट्री में नौकरी खोज ली. जब उन्होंने काम करना शुरू किया तब उनकी पोतियों की उम्र 5 साल और 2 साल थी.

सरकारी तंत्र से क्यों हैं नाराज?

अब दोनों 14 साल और 11 साल की हो गई हैं और वीरवती 68 साल की हो गई हैं. आज भी वो दोनों के लिए फैक्ट्री जाती हैं, ताकि उन दोनों का जीवन बेहतर रास्ते पर आगे बढ़ सके. वीरवती इस समय बिलासपुर कस्बे में जैन धर्मशाला के पीछे झोपड़ी में रहती हैं. वो हालात के साथ-साथ सिस्टम से भी नाराज हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास राशन कार्ड तक नहीं है. इसे बनवाने के लिए उन्होंने सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर काटे, लेकिन हमेशा उन्हें खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा. उन्हें उम्मीद है कि सरकार की तरफ से उन्हें कुछ मदद मिलेगी और जीवन के आखिरी पड़ाव में रास्ता कुछ आसान हो जाएगा.

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