Iran-Israel War: तेल ही नहीं, अब आपकी थाली पर भी मंडराया खतरा; मिडिल ईस्ट युद्ध से खाद की सप्लाई टूटी, भारत में बढ़ सकती है महंगाई

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से दुनिया भर में फर्टिलाइजर (उर्वरक) का संकट पैदा हो गया है। यूरिया और अमोनिया की सप्लाई बाधित होने से वैश्विक खाद्य उत्पादन पर असर पड़ सकता है। भारत, जो अपनी खाद जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, वहां खेती की लागत और अनाज की कीमतें बढ़ने की आशंका है।

मिडिल ईस्ट में सुलगती ईरान-इजराइल युद्ध की चिंगारी अब दुनिया के लिए एक ऐसा खतरा पैदा कर रही है, जिसकी आंच सीधे आपकी रसोई तक पहुंचने वाली है. अब तक हर जगह सिर्फ कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों की चर्चा हो रही है, लेकिन अर्थशास्त्रियों की मानें तो यह आधी तस्वीर है. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही रुकने से कहीं अधिक खौफनाक है उर्वरक यानी खाद की सप्लाई चेन का टूटना. यह एक ऐसा संकट है जो आने वाले महीनों में वैश्विक खाद्य उत्पादन को धीमा कर देगा और महंगाई को एक नए स्तर पर ले जाएगा. भारत, जो अपनी कृषि जरूरतों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है, इस तूफान से अछूता नहीं रहने वाला है.

खाड़ी देशों से जुड़ी है दुनिया की खाद्य सुरक्षा

मध्य पूर्व का नाम सुनते ही जहन में सिर्फ तेल के कुएं आते हैं, लेकिन सऊदी अरब, कतर, ओमान और यूएई यूरिया, सल्फर और अमोनिया के सबसे बड़े वैश्विक सप्लायर हैं. अकेले ईरान दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अमोनिया उत्पादक है. यह रसायन फसलों को पोषण देने वाले उर्वरकों की जान है. यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इन देशों से फर्टिलाइजर का उत्पादन और जहाजों के जरिए इसका परिवहन बुरी तरह चरमरा जाएगा. खेती-किसानी के नए मौसम से ठीक पहले सप्लाई रुकने का सीधा मतलब है कि किसानों के पास पर्याप्त खाद नहीं होगी, जिसका असर सीधे तौर पर अनाज की पैदावार पर पड़ेगा.

रूस,चीन से भी टूट रही है उम्मीद

इस तनाव का असर वैश्विक बाजारों में दिखने लगा है. शिपिंग रूट अस्थिर हो गए हैं और कई प्लांट में उत्पादन घट गया है. यूरोप में अमोनिया के दाम 725 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गए हैं और मध्य पूर्व में भी यूरिया की कीमतों में आग लगी हुई है. ऐसे में उम्मीद की जाती है कि दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइजर निर्यातक रूस इस कमी को पूरा करेगा, लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता की अपनी सीमाएं हैं. वहीं, चीन ने फॉस्फेट के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है और कतर में सल्फर का उत्पादन गिर चुका है. इन तमाम वजहों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की भारी किल्लत पैदा हो गई है.

भारत के किसानों पर पड़ेगा असर

भारत हर महीने अपनी जरूरत का करीब 20 लाख टन फर्टिलाइजर विदेशों से मंगाता है. आंकड़ों पर गौर करें तो हम म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) के लिए 100 प्रतिशत और डीएपी (DAP) के लिए 60 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर हैं. पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में ही भारत सरकार ने फर्टिलाइजर सब्सिडी पर लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. विशेषज्ञों का अनुमान है कि मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने से यूरिया की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक का भारी उछाल आ सकता है.

इसका सीधा गणित यह है कि या तो सरकार का सब्सिडी का बोझ बेतहाशा बढ़ेगा, या फिर किसानों की खेती की लागत. महंगे फर्टिलाइजर के कारण अगर किसान कम खाद का इस्तेमाल करते हैं या कम पैदावार वाली फसलें चुनते हैं, तो अनाज का उत्पादन गिरेगा. मंडियों में अनाज कम पहुंचेगा तो खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी.

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