SC अभ्यर्थी को सुप्रीम कोर्ट से राहत: सिविल जज बनने के लिए हाईकोर्ट विचार करे छूट पर
महज 1.9 अंकों से सिविल जज बनने से चूकी दीक्षा काल्सन को सुप्रीम कोर्ट से राहत। SC वर्ग के खाली 30 पदों को देखते हुए हाईकोर्ट को नियमों में छूट देने के निर्देश।
गुरुग्राम : हरियाणा की अनुसूचित जाति (एस.सी.) वर्ग की अभ्यर्थी दीक्षा काल्सन, जो महज 1.9 अंकों से सिविल जज बनने से चूक गई थीं, को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उन्हें एक और मौका देते हुए पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह आरक्षित वर्ग के लिए निर्धारित 45 प्रतिशत न्यूनतम अंकों की शर्त में छूट देने पर विचार करे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की पीठ ने 20 मार्च को मामले की सुनवाई की और दीक्षा की विशेष अनुमति याचिका (एस.एल.पी.) का निपटारा करते हुए उन्हें हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे। यह हस्तक्षेप ऐसे समय आया है जब इससे पहले हाईकोर्ट दीक्षा की याचिका को खारिज कर चुका था। जनवरी, 2026 में हाईकोर्ट ने उनकी पुनर्विचार याचिका को भी ठुकराते हुए फरवरी, 2025 के अपने फैसले को बरकरार रखा था। अदालत ने भर्ती विज्ञापन के क्लॉज 33 का हवाला दिया जिसमें उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन पर स्पष्ट रोक है। दीक्षा काल्सन का मामला अपने अलग तरह के विवाद के कारण चर्चा में आया। वह एस.सी. वर्ग के लिए निर्धारित 495 अंकों की कट ऑफ से केवल 1.9 अंक कम रह गई थीं। इसके बाद उन्होंने आर.टी.आई. के जरिए अपनी उत्तर पुस्तिका प्राप्त की जिसमें पता चला कि सुवक्ता शब्द से जुड़े एक प्रश्न में उन्हें शून्य अंक दिए गए थे। उनका उत्तर उनके अनुसार पूरी तरह व्याकरणिक रूप से सही था, लेकिन परीक्षक ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस आधार पर भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित करने वाला पहलू कुछ और था। अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि एस.सी. वर्ग के लिए आरक्षित 39 पदों में से केवल 9 ही भरे गए। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय आर हेगड़े, जो दीक्षा की ओर से पेश हुए, ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह मामले पर ‘सहानुभूतिपूर्वक’ विचार करे, भले ही न्यायिक पक्ष में पहले क्या निर्णय लिया गया हो। याचिका तैयार करने वाले अधिवक्ता कुमार अभिषेक के अनुसार हाईकोर्ट की चयन समिति जिसमें मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं, के पास आवश्यक शर्तों में छूट देने का अधिकार होता है, खासकर तब जब किसी वर्ग में पर्याप्त उम्मीदवार उपलब्ध न हों। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश बाध्यकारी नहीं है लेकिन इसका नैतिक प्रभाव काफी महत्वपूर्ण होता है। अब गेंद पूरी तरह हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के पाले में है जो इस मामले में अंतिम निर्णय लेगा। फिलहाल दीक्षा काल्सन के लिए इंतजार जारी है, जिनका सपना सिर्फ 1.9 अंक और एक विवादित उत्तर के कारण अधूरा रह गया था।