पंचकूला के एनसीसी कैडेट विजयन्त सिंह ढाण्डा का डीजी टीम में चयन, ओलंपिक में देश का नाम रोशन करना है लक्ष्य

पंचकूला के एनसीसी कैडेट विजयन्त सिंह ढाण्डा का डीजी टीम में चयन। ओलंपिक और विश्व प्रतियोगिता में मेडल जीतना है लक्ष्य।

पंचकूला: पंचकूला निवासी एवं एनसीसी कैडेट विजयन्त सिंह ढाण्डा का चयन डायरेक्टर जनरल ऑफ नेशनल कैडेट कोर (डीजी) एनसीसी टीम में हुआ है. दरअसल, देश भर से डीजी टीम के लिए केवल 12 बेस्ट शूटर ही चुने जाते हैं. इनमें से इस साल एयर विंग से 50 मीटर 3पी राइफल प्रतियोगिता के लिए हरियाणा से कई साल बाद विजयन्त का चयन हुआ है. बेटे की मेहनत और उसके डीजी टीम में चयन पर परिवार काफी खुश है.पिता एडवोकेट सतबीर ढाण्डा और मां पूजा ने बेटे की कामयाबी पर खुशी जाहिर करते हुए उसे अगले लक्ष्य के लिए शुभकामनाएं दी.

विजयन्त ने बताया अपना लक्ष्य:  विजयन्त सिंह ढाण्डा ने बताया कि, “डीजी टीम में शामिल होने के बाद मेरा अगला लक्ष्य विश्व प्रतियोगिता और ओलंपिक की तैयारी करना है, ताकि मैं देश के लिए और एक पदक जीत सकूं. मैं वर्ल्ड चैंपियन बनना चाहते हूं. मैं फॉरेंसिक साइंस में बीएससी सेकेंड ईयर के छात्र हूं. लेकिन परिवार के सहयोग से पढ़ाई और गेम, दोनों को समय दे पाता हूं. जीवी मावलंकर शूटिंग प्रतियोगिता में क्वालीफाई करने के बाद मेरा अगला लक्ष्य नेशनल गेम्स हैं. फिर भारतीय टीम में शामिल होना और अंतरराष्ट्रीय ट्रायल में आगे रहना है. मैं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता और वर्ल्ड कप में पदक जीतने के लिए प्रैक्टिस कर खुद पर काफी काफी काम कर रहा हूं.”

सुबह से शाम तक खुद पर काम: विजयन्त सिंह ढाण्डा ने कहा कि, ” मैं चंडीगढ़ सेक्टर-25 स्थित पुलिस शूटिंग रेंज में अपने कोच करन सिंह से प्रशिक्षण ले रहा हूं. शूटिंग में संतुलन और धैर्य बनाए रखना बहुत जरूरी होता है. यदि कोई बॉडी पार्ट असंतुलित हुआ या कोई मसल्स एक्टिव रह गया तो शॉट दस के बजाय 5-6 पर जाकर लगता है. नतीजतन, एक शॉट के कारण पूरा मैच बदल जाता है.”

स्टैंडिंग पोजिशन पर काम करना जरूरी: विजयन्त सिंह ढाण्डा ने आगे कहा कि, “मेरा इवेंट 50 मीटर 3पी राइफल है, जिसमें तीन तरह की पोजिशन होती है. पहली नीलिंग पोजिशन में घुटने के बल बैठा जाता है, जो हर प्रतिभागी की औसत रहती है. दूसरी प्रोन पोजिशन में लेटकर फायर करना होता है. जबकि तीसरी स्टैंडिंग पोजिशन है, जो कि मेरे लिए थोड़ा मु्श्किल है. शारीरक कद-काठी ऊंची होने से इस पोजिशन में आकर फायर सटीक जगह करने में थोड़ी परेशानी महसूस होती है. कद ऊंचा होने पर बॉडी स्ट्रक्चर को मेंटेन रखने में मुश्किलें शुरू हो जाती हैं. टांगे और कंधों को सही तरीके से मेंटेन करना होता है. जब सांस अंदर-बाहर होती है तो बॉडी हल्की दाएं-बाएं व उपर-नीचे मूव होती है. बॉडी को ठहराव (स्टेबल) रखते हुए फायर करना होता है, जिस कारण स्टैंडिंग पोजिशन मुश्किल हो जाती है.”

लक्ष्य के लिए चौबीस घंटे की कनेक्टिविटी: विजयन्त ने बताया कि, “मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए रोजाना करीब 4-5 घंटे प्रेक्टिस करता हूं. बाकी समय भी एक-दूसरे से जुड़ा रहता है. शूटिंग की प्रेक्टिस के अलावा मैं सुबह पांच बजे उठकर योगा करता हूं, फिर शूटिंग रेंज जाकर करीब पांच घंटे प्रेक्टिस करता हूं. इसके अलावा मसल्स पर काम करने के लिए जिम जाना होता है और फिर शाम को मसल्स, सांस और दिल को दुरूस्त रखने के लिए रनिंग करनी होती है.”

इंटर ग्रुप शूटिंग स्पॉर्ट्स प्रतियोगिता: विजयन्त ने कहा कि, “हर साल एनसीसी देश के बेस्ट शूटर्स के लिए इंटर ग्रुप शूटिंग स्पॉर्ट्स प्रतियोगिता आयोजित करता है. देश भर में एनसीसी नवंबर-दिसंबर-जनवरी में यूनिट्स प्रतियोगिता आयोजित कराता है, जहां हर यूनिट के बच्चे आकर प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हैं. फिर चयन होते-होते प्रत्येक डायरेटरेट में इंटर ग्रुप शूटिंग कॉम्पटीशन होता है, जहां हर ग्रुप से प्रत्येक इवेंट में दो-दो बच्चे आते हैं. फिर इंटर डायेरक्ट स्पॉर्ट्स शूटिंग प्रतियोगिता में कॉम्पटीशन होता है. इस प्रतियोगिता में देश भर से सभी 17 डायरेक्टरेट के बच्चे पहुंचते हैं.”

तमिलनाडु में आईडीएसएससी प्रतियोगिता: विजयन्त ने आगे कहा कि, “इस साल इंटर निदेशालय खेल शूटिंग प्रतियोगिता (IDSSC) तमिलनाडू में आयोजित की गई, जहां सभी 17 डायरेक्टरेट के प्रत्येक इवेंट के दो-दो बच्चे, यानी कि कुल 34 प्रतिभागी पहुंचे. इनमें से देश भर से टॉप-12 एनसीसी कैडेट चुने गए. ऐसे ही हर साल बेस्ट एनसीसी कैडेट शूटर डीजी टीम में शामिल होते हैं. फिर डीजी टीम देश भर में प्रतिस्पर्धा करती है और इंडियन टीम में चयन व ओलंपिक के लिए तैयारी भी कर पाती है.”

इंडियन टीम के ट्रायल का समय: टीम के ट्रायल टाइम को लेकर विजयन्त सिंह ढाण्डा ने बताया कि, “एनसीसी में इंटर ग्रुप में सिलेक्ट होने पर स्टेट खेलते हैं. फिर प्री-नेशनल, मावलंकर गेम्स और नेशनल गेम्स खेली जाती हैं. इसके बाद इंडियन टीम के ट्रायल तक पहुंचना होता है, जो ट्रायल करीब एक वर्ष तक जारी रहते हैं. इंडियन टीम के छह ट्रायल होते हैं (हर तिमाही पर दो-दो) ट्रायल लिए जाते हैं. कोई भी खिलाड़ी जब हर स्तर पर लगातार क्वालिफाई करता है तो इस चरण को पूरा होने में करीब डेढ़-दो वर्ष का समय लगता है.हर स्तर पर नई-नई मुश्किलें आती हैं, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने पर शॉट चलाना सीख लिया जाता है. लेकिन इसके बाद कोच व अन्य छोटी-छोटी कमियां बताते हैं, जिनका सुधार कर आगे बढ़ा जाता है.”

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