पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी पहुंचे दिल्ली हाई कोर्ट, सीएपीएफ तैनाती के कानूनी आधार पर उठाए सवाल

दिल्ली में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की बार-बार तैनाती के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। जानिए याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें।

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था की स्थिति को संभालने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की बड़े पैमाने पर तैनाती को बार-बार विस्तारित (Extend) किए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है। सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक सेवक आशीष जोशी ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है।

अधिवक्ता अंबुज दीक्षित और अमरीश रंजन पांडे के माध्यम से प्रस्तुत इस याचिका में दिल्ली में तैनात सुरक्षा बलों की आवश्यकता, अनुपात, समय-सीमा और उनकी नियमित समीक्षा जैसे कानूनी व प्रशासनिक पहलुओं की विस्तृत न्यायिक समीक्षा करने की मांग की गई है।

📊 301 से 270 कंपनियों का विस्तार: याचिका में दिए गए आंकड़ों का ब्योरा

याचिकाकर्ता ने विभिन्न आधिकारिक रिपोर्टों का हवाला देते हुए सुरक्षा बलों की चरणबद्ध तैनाती के आंकड़े अदालत के समक्ष रखे हैं:

  • प्रारंभिक स्वीकृति: शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी में सीएपीएफ (CAPF) की कुल 301 कंपनियों को मंजूरी प्रदान की गई थी।

  • पहला विस्तार: इसके बाद 273 कंपनियों की तैनाती को 31 अक्टूबर 2026 तक बरकरार रखा गया।

  • दूसरा विस्तार: हालिया आदेशों के अनुसार, 270 कंपनियों की तैनाती की अवधि को और बढ़ाते हुए 16 नवंबर 2026 तक कर दिया गया है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि इस तरह बिना स्पष्ट न्यायिक आधार के सुरक्षा बलों का बार-बार विस्तार नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक सभा (Protest) के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

📋 गृह मंत्रालय का मूल आदेश, रिस्क असेसमेंट और लिखित प्रोटोकॉल की प्रमुख मांगें

याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट से केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है:

  1. आधिकारिक रिकॉर्ड पेश करना: गृह मंत्रालय (MHA) का मूल आदेश, दिल्ली पुलिस की मांग-पत्र, जोखिम का सटीक आकलन (Risk Assessment) और बल-वार सटीक आंकड़े अदालत के रिकॉर्ड पर रखे जाएं।

  2. राष्ट्रीय सुरक्षा अभियानों पर असर का आकलन: इस तरह बड़े पैमाने पर दिल्ली में तैनाती का असर सीमा सुरक्षा, उग्रवाद-विरोधी अभियानों, चुनाव की तैयारियों और आपदा प्रबंधन जैसे अन्य संवेदनशील कर्तव्यों पर क्या पड़ रहा है, इसका निष्पक्ष आकलन हो।

  3. हर 14 दिन पर अनिवार्य समीक्षा: यदि बलों की तैनाती आगे बढ़ानी अनिवार्य हो, तो उसके लिए स्पष्ट लिखित व तर्कपूर्ण आदेश जारी किए जाएं और अधिकतम हर 14 दिन के अंतराल पर अनिवार्य समीक्षा की जाए।

  4. लिखित एसओपी (SOP) व प्रोटोकॉल: नागरिक प्रशासन और कमांड स्ट्रक्चर के बीच जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने के लिए एक पारदर्शी लिखित प्रोटोकॉल का निर्माण किया जाए।

🛑 “सीएपीएफ की केवल मौजूदगी बल प्रयोग या हिरासत का स्वतः अधिकार नहीं”

जनहित याचिका में अदालत से यह घोषित करने का विशेष आग्रह किया गया है कि केवल सीएपीएफ की तैनाती का आदेश मिलने मात्र से पुलिस या सुरक्षा बलों को शांतिपूर्ण सभाओं को जबरन तितर-बितर करने, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने या बल प्रयोग करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि नागरिकों के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक या निरोधात्मक कार्रवाई को स्वतंत्र रूप से कानूनी और संवैधानिक मानकों पर खरा उतरना होगा।

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