ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम मोदी ने उठाए क्रिटिकल मिनरल्स और टेक्नोलॉजी के मुद्दे, चीन को संदेश
पीएम मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन में क्रिटिकल मिनरल्स पर जताई चिंता। जानिए रेयर अर्थ सप्लाई चेन और चीन के दबदबे की पूरी कहानी।
दुनिया भर में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स समिट के आखिर दिन टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई. दिलचस्प बात यह रही है कि पीएम ने यह बात ओपन सेशन के दौरान कही और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंक भी वहां मौजूद थे. हालांकि, पीएम ने अपने बयान में किसी देश का नाम नहीं लिया मगर इसे चीन के लिए एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
ग्लोबल टेंशन के बीच में जहां एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी टैरिफ नीतियों से पूरी दुनिया की इकोनॉमी को हिलाकर रख दिया, तो वहीं चीन ने अपने रेयर अर्थ के दम पर सभी को लाल आंख दिखाई. ऐसे में ब्रिक्स 2026 में पहले टैरिफ के विरोध में जब न्यू दिल्ली डेक्लेरेशन 2026 में बात हुई तो उसके बाद क्रिटिकल मिनिरल पर बात होना अपने आप में दिलचस्प है, क्योंकि पीएम मोदी ने जब यह बात की तो बगल में ही शी जिनपिंक बैठे हुए थे. इन सभी बयानों के बीच सवाल यह है कि आखिर रेयर अर्थ और दूसरे क्रिटिकल मिनरल्स इतने जरूरी क्यों हैं, चीन का इस सेक्टर में दबदबा कितना बड़ा है और भारत की डिपेंडेंसी कितनी है?
चीन के पास कितना रेयर अर्थ है?
अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे यानी USGS के मुताबिक चीन के पास करीब 44 मिलियन मीट्रिक टन रेयर अर्थ ऑक्साइड (REO) रिजर्व है. ब्राजील के पास करीब 21 मिलियन टन रिजर्व है. चीन के प्रमुख रेयर-अर्थ रिसोर्स इनर मंगोलिया के बायान ओबो, जियांग्शी के गानझोऊ और सिचुआन के लियांगशान जैसे इलाकों में हैं. हालांकि चीन की ताकत सिर्फ उसके मिनरल रिजर्व तक सीमित नहीं है. असली स्ट्रैटेजिक बढ़त माइनिंग के बाद प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग में है.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी यानी IEA के मुताबिक 2024 में मैग्नेट रेयर अर्थ के ग्लोबल माइनिंग प्रोडक्शन में चीन की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत थी. रिफाइंड आउटपुट में उसकी हिस्सेदारी करीब 91 प्रतिशत, जबकि सिंटर्ड परमानेंट मैग्नेट प्रोडक्शन में चीन की हिस्सेदारी करीब 94 प्रतिशत थी. इसका मतलब यह है कि दुनिया के दूसरे देशों में रेयर अर्थ की माइनिंग होने के बावजूद उसे हाई-क्वालिटी इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स और खासकर हाई-परफॉर्मेंस परमानेंट मैग्नेट में बदलने की कैपेसिटी काफी हद तक चीन के पास है.
चीन ने रेयर अर्थ पर कब और कैसे लगाए एक्सपोर्ट कंट्रोल?
पिछले कुछ समय में चीन ने रेयर अर्थ और उनसे जुड़ी सप्लाई चेन पर एक्सपोर्ट कंट्रोल बढ़ाए हैं. अप्रैल 2025 में चीन ने सात मीडियम और हेवी रेयर-अर्थ एलिमेंट्स- समेरियम, गैडोलिनियम, टर्बियम, डिस्प्रोसियम, ल्यूटेशियम, स्कैंडियम और यत्रियम के एक्सपोर्ट पर लाइसेंस सिस्टम लागू किया. इसके बाद अक्टूबर 2025 में चीन ने इन एक्सपोर्ट कंट्रोल का दायरा और बढ़ाया. नए उपायों में चीन से बाहर बनने वाले कुछ प्रोडक्ट्स तक भी कंट्रोल का दायरा बढ़ाने का प्रावधान था, अगर उनमें चीनी ओरिजिन के रेयर अर्थ का इस्तेमाल हुआ हो.
हालांकि इन एक्सपैंडेड अक्टूबर 2025 वाले उपायों को बाद में एक साल के लिए स्थगित किया गया. यह सस्पेंशन 10 नवंबर 2026 तक है. वहीं, अप्रैल 2025 में लागू की गई ओरिजिनल लाइसेंस व्यवस्था जारी रही. चीन के कस्टम डेटा के मुताबिक 2025 में उसके रेयर-अर्थ एक्सपोर्ट करीब 62,580 टन रहे, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 12.9 प्रतिशत ज्यादा थे. जनवरी-फरवरी 2026 में भी चीन के रेयर-अर्थ एक्सपोर्ट सालाना आधार पर करीब 23 प्रतिशत बढ़े. इससे तस्वीर यह सामने आती है कि चीन ने एक तरफ एक्सपोर्ट कंट्रोल की व्यवस्था मजबूत की है. वहीं, दूसरी तरफ कुछ सिचुएशंस में लाइसेंस और एक्सपोर्ट प्रोसेस में राहत भी दी है. इसके बावजूद ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन की सेंट्रल भूमिका बनी हुई है.
भारत की डिपेंडेंसी कितनी है?
भारत के लिए यह मुद्दा सिर्फ डिप्लोमैटिक नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल और स्ट्रैटेजिक सिक्योरिटी से भी जुड़ा है. भारत के परमानेंट मैग्नेट इंपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार FY2024-25 में संबंधित परमानेंट-मैग्नेट कैटेगरी में चीन की क्वांटिटी-वाइज हिस्सेदारी करीब 85 से 90 प्रतिशत के बीच रही. कुछ इंडस्ट्री एस्टिमेट्स इसे करीब 93 प्रतिशत तक बताते हैं. अलग-अलग आंकड़ों में फर्क मुख्य रूप से इस्तेमाल किए गए HS कोड्स और प्रोडक्ट्स की डेफिनिशन की वजह से है.
FY2024-25 में भारत ने करीब 53,700 टन परमानेंट मैग्नेट का इंपोर्ट किया था, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में काफी ज्यादा था. इस इंपोर्ट में चीन की बड़ी हिस्सेदारी रही. यही वजह है कि चीन की ओर से रेयर-अर्थ मैग्नेट की सप्लाई में किसी भी तरह की रुकावट भारत के ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स पर असर डाल सकती है.
EV और डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों जरूरी हैं रेयर अर्थ मैग्नेट?
रेयर-अर्थ मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की मोटर्स, विंड टर्बाइन्स, इंडस्ट्रियल मोटर्स और कई हाई-टेक सिस्टम्स में होता है. खासतौर पर नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) मैग्नेट अपनी हाई स्ट्रेंथ और छोटे साइज के कारण इलेक्ट्रिक मोटर जैसी टेक्नोलॉजी में अहम हैं. कुछ मामलों में डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स का इस्तेमाल मैग्नेट की हाई टेंपरेचर परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए किया जाता है.
डिफेंस सेक्टर में भी रेयर अर्थ बेस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कई एडवांस सिस्टम्स में होता है. इनमें सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और कुछ तरह की प्रिसिजन टेक्नोलॉजी शामिल हैं. इसलिए रेयर अर्थ की सप्लाई में रुकावट सिर्फ किसी एक इंडस्ट्री की समस्या नहीं है. इसका असर एनर्जी ट्रांजिशन, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस जैसे स्ट्रैटेजिक सेक्टर्स पर पड़ सकता है.
भारत के सामने चुनौती सिर्फ माइनिंग की नहीं
भारत के लिए प्रॉब्लम यह भी है कि सिर्फ डोमेस्टिक माइनिंग बढ़ाने से पूरी डिपेंडेंसी खत्म नहीं होगी. रेयर अर्थ की वैल्यू चेन में माइनिंग, सेपरेशन, रिफाइनिंग, एलॉय प्रोडक्शन और मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई स्टेप्स होते हैं. भारत अपनी डिपेंडेंसी कम करने के लिए डोमेस्टिक कैपेसिटी बढ़ाने के साथ-साथ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के साथ क्रिटिकल-मिनरल कोऑपरेशन पर भी काम कर रहा है.
इसके अलावा विदेशों में मिनरल रिसोर्स तक पहुंच बनाने, डोमेस्टिक प्रोसेसिंग कैपेसिटी विकसित करने और रिसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है. डोमेस्टिक लेवल पर बैटरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बढ़ाने की कोशिशें भी जारी हैं. जनवरी 2026 की एक असेसमेंट के मुताबिक अक्टूबर 2025 तक सरकार की टारगेटेड बैटरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की तुलना में करीब 1.4 GWh कैपेसिटी चालू हुई थी.
भारत के लिए असली सवाल क्या है?
ब्रिक्स मंच पर प्रधानमंत्री मोदी की टिप्पणी को चीन के साथ चल रही व्यापक सप्लाई-चेन और ट्रेड रिलेशन से जुड़ी बातचीत के संदर्भ में देखा जा सकता है. चीन की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं है कि उसके पास बड़ी मात्रा में रेयर-अर्थ रिसोर्स हैं. उसकी सबसे बड़ी बढ़त इस पूरी वैल्यू चेन के प्रोसेसिंग और मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग हिस्से में है.
भारत के लिए चुनौती इसलिए दो लेवल पर है. एक तरफ उसे दूसरे देशों के साथ क्रिटिकल-मिनरल पार्टनरशिप और अल्टरनेटिव सप्लाई चेन विकसित करनी होंगी. दूसरी तरफ डोमेस्टिक लेवल पर माइनिंग के साथ सेपरेशन, रिफाइनिंग और मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग की कैपेसिटी भी बढ़ानी होगी. आखिरकार डिप्लोमैटिक लेवल पर सप्लाई चेन को सिक्योर बनाने की कोशिश तभी असरदार होगी, जब भारत अपनी डोमेस्टिक कैपेसिटी भी तेजी से बढ़ा सके. चीन की रेयर-अर्थ वैल्यू चेन में मौजूदा पकड़ को देखते हुए यही भारत के लिए सबसे बड़ी स्ट्रैटेजिक चुनौती है.