राजधानी की सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रहीं पर्दे और काले शीशे लगी बसें, पुलिस और प्रशासन बेखबर

दिल्ली में गैंगरेप मामले में जब्त बस के नाम पर जुलाई में ही यूपी में हुए थे 8 चालान। बिना परमिट और तेज रफ्तार से दौड़ रही थी बस।

दिल्ली की कश्मीरी गेट थाना पुलिस ने किशोरी से गैंगरेप की वारदात में जिस बस को जब्त किया है, वह सड़क पर ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाती रही है। बीते जुलाई महीने में ही यूपी के विभिन्न इलाकों में इस बस के 8 चालान हुए हैं।

इनमें से अधिकांश चालान तेज रफ्तार से वाहन चलाने के हैं। बीते अप्रैल महीने में खरीदी गई इस बस पर 8 ट्रैफिक नियम उल्लंंघनों का 54 हजार रुपये चालान के बकाया हैं। यह चालान दर्शाते हैं कि बस चलाने वाला किस तरह से देर रात सड़कों पर बस को दौड़ाता रहा है।

फिरोजाबाद के युवक की है बस

वारदात में शामिल बस अनिल जादौन के नाम पर पंजीकृत है, जो यूपी के फिरोजाबाद का रहने वाला है। बीते 28 अप्रैल को इस बस का पंजीकरण यूपी में करवाया गया था। ट्रैफिक पुलिस के सूत्रों ने बताया कि इस गाड़ी के पांच चालान मथुरा में हुए हैं और यह सभी चालान तेज गति से बस दौड़ाने के चलते हुए हैं। इन सभी चालानों के लिए प्रति चालान चार हजार रुपये का जुर्माना इस बस पर लगा है।

कोई चालान नहीं भरा गया

ट्रैफिक पुलिसकर्मी सुधीर कुमार यादव ने इस बस का 26 हजार रुपये का चालान बीते 23 जुलाई को हमीरपुर में किया था। चालान में बताया गया है कि इस गाड़ी के पास परमिट नहीं था या यह परमिट का उल्लंघन कर रहा था। कोई भी चालान अभी तक भरा नहीं गया है।

सड़कों पर बेरोकटोक दौड़ रहीं पर्दे लगी बसें

बता दें कि, राजधानी दिल्ली की सड़कों पर पर्दे और काले शीशे लगी बसें बेरोकटोक दौड़ रही हैं, जबकि राज्य परिवहन प्राधिकरण (एसटीए) का स्पष्ट निर्देश है कि बसों की खिड़कियों पर पर्दे नहीं लगाए जाने चाहिए, ताकि बस के अंदर की गतिविधियां बाहर से साफ दिखाई दें, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है और इसका बड़ा कारण पुलिस व परिवहन विभाग की अनदेखी है।

केंद्रीय मोटर वाहन नियम के मुताबिक, वाहन के शीशों से बाहर से अंदर स्पष्ट दिखना चाहिए। आगे और पीछे की विंडशील्ड में कम से कम 70 प्रतिशत विजुअल लाइट ट्रांसमिशन (वीएलटी) और साइड की खिड़कियों में कम से कम 50 प्रतिशत वीएलटी अनिवार्य है। इसी आधार पर मार्च 2013 में एसटीए ने बसों के परमिट को लेकर जारी नियमावली में साफ तौर पर कहा था कि किसी भी बस में पर्दे या फिल्म लगे शीशे नहीं होने चाहिए। यह नियम खासतौर पर महिला यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था, ताकि किसी भी अप्रिय घटना पर तुरंत नजर रखी जा सके और समय रहते हस्तक्षेप हो सके।

इसके बावजूद पांडव नगर, आनंद विहार, कश्मीरी गेट, सीलमपुर, मयूर विहार, लाल किला और धौला कुआं जैसे कई इलाकों से रोजाना चलने वाली निजी ऑपरेटरों की बसों में पर्दे या डार्क फिल्म आम बात है। न तो परिवहन विभाग और न ही दिल्ली ट्रैफिक पुलिस इस पर कोई ठोस कार्रवाई करती दिख रही है। ये बसें बीच रास्ते से भी सवारियां चढ़ाती हैं और इनकी नियमित जांच भी नहीं होती।

जांच को लेकर सख्ती नहीं

बसों के लिए बने नियम का पालन सख्ती से नहीं हो रहा है। इसका प्रमुख कारण समय-समय पर औचक जांच न किया जाना है। इस कारण बस ऑपरेटर धड़ल्ले से नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं। किसी बड़ी घटना के बाद पुलिस और प्रशासन की टीमें जांच करती हैं, लेकिन कुछ समय बाद ही यह भी बंद हो जाता है।

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