घर में कौन सी गणेश मूर्ति लाना है सबसे शुभ? जानिए सूंड की दिशा और बैठने की मुद्रा का महत्व
घर के लिए कैसी गणेश मूर्ति शुभ होती है? जानिए बैठी हुई प्रतिमा और दाईं-बाईं सूंड वाले गणेश जी से जुड़े जरूरी नियम।
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. आज घर-घर में गणपति बप्पा की स्थापना की जा रही है और यह पावन उत्सव शुरू हो गया है. बाजार में गणेश जी की अलग-अलग मुद्राओं और अलग-अलग दिशाओं में सूंड वाली मूर्तियां मिलती हैं. हालांकि, घर के लिए प्रतिमा चुनते समय लोग अक्सर उलझन में पड़ जाते हैं कि कौन सी मूर्ति लाना सबसे सही रहेगा. प्रतिमा की मुद्रा और उनकी सूंड किस दिशा में मुड़ी हुई है, इसका बहुत बड़ा महत्व होता है. आइए जानते हैं कि बैठी हुई मूर्ति और दाईं या बाईं ओर सूंड होने से क्या बड़ा अंतर पड़ता है?
घर के लिए बैठी हुई मूर्ति का विशेष महत्व
घर के लिए बैठी हुई मुद्रा वाली गणेश जी की मूर्ति सबसे शुभ मानी जाती है. बैठी हुई प्रतिमा घर में सुख, समृद्धि और स्थायित्व का प्रतीक होती है. जब बप्पा घर में आकर बैठते हैं, तो ऐसा माना जाता है कि सुख और शांति लंबे समय तक बनी रहती है. दूसरी ओर, खड़ी मुद्रा वाली मूर्ति दुकानों या कार्यस्थलों के लिए उपयुक्त होती है. घर के मंदिर में कभी भी खड़ी प्रतिमा रखने से बचना चाहिए. इसलिए जब भी अपने घर के लिए मूर्ति लाएं, तो बैठी हुई अवस्था वाली प्रतिमा ही पसंद करें. इस बात का ध्यान रखने से घर में स्थिरता बनी रहती है और परिवार के सदस्यों का जीवन खुशहाली से भरा रहता है.
बाईं ओर सूंड वाले गणेश जी और गृहस्थ जीवन
बाईं ओर सूंड वाले गणेश जी को रिद्धि-सिद्धिदाता माना जाता है. इनकी सूंड बाईं तरफ मुड़ी होती है और यह चंद्रमा से प्रभावित होते हैं. इसी कारण से यह अत्यंत सौम्य माने जाते हैं. इनकी पूजा-अर्चना करने के नियम बहुत ही सरल और सहज होते हैं. कोई भी सामान्य व्यक्ति बहुत आसानी से इनकी उपासना कर सकता है. इसी वजह से गृहस्थ जीवन में बाईं सूंड वाले गणेश जी की स्थापना को सबसे उत्तम और शुभ माना जाता है. अपने घर में बाईं तरफ सूंड वाली प्रतिमा लाने से परिवार में बहुत शांति और मिठास बनी रहती है. गृहस्थ लोगों को हमेशा इसी रूप की पूजा अपने घर के मंदिर में करनी चाहिए.
दाईं ओर सूंड वाले गणेश जी और कड़े नियम
दूसरी तरफ दाईं ओर सूंड वाले गणेश जी सूर्य से प्रभावित होते हैं. यह रूप अत्यंत हठी और तेजस्वी माना जाता है. इनकी पूजा में कर्मकांड और शुद्धता के बहुत ही कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है. यदि पूजन के नियमों में जरा सी भी चूक हो जाए, तो ठीक नहीं माना जाता. इसी कड़े विधान के कारण दाईं सूंड वाले गणेश जी को मुख्य रूप से मंदिरों में ही स्थापित किया जाता है. सामान्य घरों में इस रूप को रखना बहुत कठिन होता है, क्योंकि हर कोई इतने कठिन नियमों को पूरा नहीं कर पाता. इसलिए घर के लिए हमेशा बाईं ओर सूंड वाली बैठी हुई मूर्ति लाना ही सबसे बुद्धिमानी माना जाता है.