बीजेपी की मजबूत पकड़ के सामने कैसे वापसी की कोशिश कर रही है कांग्रेस और अन्य पार्टियां, जानिए सियासी समीकरण
2014 के बाद हरियाणा की राजनीति में बीजेपी का दबदबा। कांग्रेस की संगठन निर्माण की रणनीति और क्षेत्रीय दलों के संघर्ष की पूरी रिपोर्ट।
चंडीगढ़: हरियाणा में सियासी दल लगातार खुद को जनता के बीच मजबूत करने में जुटे हुए हैं. एक ओर बीजेपी संगठन और सरकार प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिवस पर पूरे एक महीने 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक कई कार्यक्रम कर रही है. वहीं, दूसरी ओर विपक्ष यानी कांग्रेस लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाकर लगातार जमीनी स्तर पर खुद की पकड़ को मजबूत करने में जुटी हुई है. साथ ही संगठन को मजबूत करने में अपना दम लगा रही है.
हालांकि साल 2014 के बाद हरियाणा के परिदृश्य में बीजेपी आज तमाम विपक्षी दलों से नेतृत्व और नेताओं के बड़े चेहरों और संगठन को लेकर विपक्ष पर भारी दिखाई देती है. जबकि कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल राजनीतिक चेहरों की कमी से जूझते नजर आते हैं. हालांकि कांग्रेस संगठन को फोकस करके आगे बढ़ रही है.
12 साल में हरियाणा में आया बड़ा सियासी बदलाव: अगर हम साल 2014 के बाद हरियाणा की राजनीति को देखते हैं तो साफ तौर पर दिखाई देता है कि बीजेपी ने खुद को प्रदेश में उस स्थिति में ले आया है, जहां उसके पास एक मजबूत संगठन तो है ही, लेकिन नेताओं की भी बड़ी फौज हो चुकी है. साल 2014 से पहले विधानसभा चुनावों में बीजेपी के लिए मजबूत चेहरों की तलाश करना चुनौती होती थी. लेकिन आज के दौर में हालात बदल गए हैं. बीजेपी के पास एक मजबूत संगठन तो है ही, साथ ही चेहरों की भी कमी नहीं है. इस मामले में बीजेपी प्रदेश के सभी दलों पर भारी पड़ती दिखाई देती है.
पीएम मोदी के जन्मदिन पर एक महीने के कार्यक्रम: साल 2014 में पहली बार हरियाणा की सत्ता में आई बीजेपी जिस तरह से आगे बढ़ रही है, उसे देखकर लगता है कि अभी हरियाणा में उसके मुकाबले के लिए विपक्ष को कड़ी मेहनत करनी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक पार्टी सेवा संकल्प अभियान के जरिए कई कार्यक्रम कर रही है. यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं है, बल्कि पार्टी की जमीनी स्तर पर संगठन की मजबूती को भी दिखा रहा है. इन कार्यक्रमों के जरिए न सिर्फ बीजेपी के संगठन की ताकत दिख रही है, बल्कि जनता के बीच पहुंच को भी पार्टी लगातार बनाए हुए है. जो यह दिखाता है कि भले ही प्रदेश की सत्ता में बीजेपी तीसरी बार आई है, लेकिन उसका संगठन इतने पर ही रुकने वाला नहीं है.
संगठन के साथ नेतृत्व की भी कमी नहीं: बीजेपी के पास आज हरियाणा में सिर्फ मजबूत संगठन ही नहीं है, बल्कि नेतृत्व की भी कमी दिखाई नहीं देती है. पार्टी के पास 2014 से पहले चेहरे तो थे, लेकिन वे इतना प्रभाव नहीं डाल पाए थे कि बीजेपी सरकार बना सके. लेकिन 2014 में दिल्ली की सत्ता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बैठने के बाद हरियाणा में कई चेहरे नेतृत्व की दृष्टि से खड़े हो गए हैं. इनमें पूर्व सीएम मनोहर लाल, मौजूदा सीएम नायब सिंह सैनी, केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर सरीखे नेता हैं, जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में दबदबा है और इसी का परिणाम है कि बीजेपी लगातार तीन बार हरियाणा की सत्ता में काबिज हो गई. साल 2014 में 90 विधायकों की विधानसभा में पार्टी के 47 विधायक थे. जबकि 2019 में 40 विधायक थे, बीजेपी ने जेजेपी और निर्दलीयों के साथ सरकार बनाई. वहीं 2024 में पार्टी ने सर्वाधिक 48 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई.
12 साल से कांग्रेस को सत्ता में वापसी की उम्मीद: इधर, साल 2014 से हरियाणा में जहां बीजेपी मजबूत हुई, वहीं कांग्रेस हाशिए पर जाती दिखी. भले ही दो बार लगातार सीएम रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ में कमान रही, लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. साल 2014 में कांग्रेस 15 सीटें जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी. हालांकि साल 2019 और साल 2024 में पार्टी ने चुनावों में अच्छा परफॉर्म किया. लेकिन वह परफॉर्मेंस पार्टी को सत्ता में वापस नहीं ला पाई. साल 2019 में कांग्रेस ने 31 और साल 2024 में 37 सीटों पर जीत दर्ज की. जबकि बीजेपी ने साल 2014 में 90 सीटों में से 47, 2019 में 40 और जेजेपी, निर्दलीयों के साथ सरकार बनाई. वहीं, साल 2024 में बीजेपी ने 48 सीटें जीतीं.
हुड्डा के आसपास रही नेतृत्व की सुई: हरियाणा में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने की वैसे तो कई वजह रही हैं, जिसमें पार्टी के नेताओं की गुटबाजी एक प्रमुख वजह मानी जाती है. क्योंकि इस दौरान पार्टी के नेतृत्व की सुई पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के आसपास ही घूमती रही. लेकिन पार्टी के सत्ता से बाहर रहने की एक बड़ी और अहम वजह यह भी रही कि इन सालों में पार्टी अपना संगठन खड़ा नहीं कर पाई. जिसकी वजह से पार्टी में कई फ्रंट खुल गए. एक धड़ा हुड्डा के करीबियों का रहा, एक कुमारी सैलजा और रणदीप सुरजेवाला सरीखे नेताओं का रहा. इस बीच प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी बदलते रहे, लेकिन कोई संगठन खड़ा नहीं कर पाया.
बीजेपी की राह पर कांग्रेस: वहीं, हरियाणा कांग्रेस तीन हार के बाद जागती दिखाई दे रही है. बीजेपी जिस मजबूत संगठन के साथ लगातार तीन बार सत्ता में आई है, अब कांग्रेस भी उस संगठन पर अपनी पूरी ताकत लगाती दिख रही है. पार्टी संगठन को बनाने की प्रक्रिया लगभग पूरी कर चुकी है. वहीं, पार्टी के नए प्रभारी संजय दत्त का फोकस भी अभी पूरी तरह संगठन को मजबूत करने में लगा हुआ है. जिसके लिए प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह और प्रभारी लगातार कार्यकर्ताओं के साथ हर जिले में बैठकें कर रहे हैं. यानी सत्ता में वापसी के लिए संगठन की जमीनी स्तर पर कमजोरी को कांग्रेस अब बीजेपी की तर्ज पर मजबूत करने में जुट गई है. हालांकि इसके परिणाम क्या होंगे, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन पार्टी समझ गई है कि संगठन के बगैर सत्ता में वापसी की उम्मीद करना उसकी बड़ी गलती होगी.
कांग्रेस में चेहरे कई लेकिन फिर भी कमी: पिछले तीन चुनाव कांग्रेस ने पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में लड़े और पार्टी तीनों चुनाव हार गई. ऐसा नहीं है कि हुड्डा कमजोर पड़ गए, लेकिन नेताओं की आपसी गुटबाजी पार्टी को भारी पड़ गई. वहीं, बीजेपी के पास जिस तरह प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों जैसे जीटी रोड, दक्षिण हरियाणा और ब्रज क्षेत्र (फरीदाबाद और पलवल) में बड़े चेहरे हैं, इसकी कमी कांग्रेस में दिखाई देती है. हालांकि पार्टी के पास कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला और चौधरी बीरेंद्र सिंह जैसे कद्दावर नेता हैं, लेकिन हुड्डा की पार्टी के अंदर मजबूती हो या फिर कोई और वजह, ये सभी प्रदेश के एक बड़े भूभाग पर वैसा असर नहीं डाल पाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं, जिससे पार्टी सत्ता में वापसी कर पाती. लेकिन बदले हालात में अब यह सभी पार्टी मंच पर कई बार एकसाथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिससे कांग्रेस के हर नेता को अब लग रहा है कि पार्टी सत्ता में वापसी कर सकती है, बशर्ते वह संगठित होकर बीजेपी का सामना करे.
इनेलो भी कर रही वापसी की कोशिश: वहीं, साल 2004 से सत्ता से बाहर चल रही इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी भी लगातार संगठन को मजबूत करने में जुटी है. पार्टी नेता लगातार लोगों के मुद्दों को उठा रहे हैं. वहीं, लोगों के बीच जाकर अपनी पकड़ को मजबूत करने में लगे हैं. ताऊ देवीलाल की जयंती के लिए 27 सितंबर को नूंह में पार्टी ने कार्यक्रम रखा है. जिसके बहाने पार्टी अपना दमखम दिखाने की कोशिश करेगी. अभी पार्टी का नेतृत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अभय चौटाला के हाथ में है. जबकि रामपाल माजरा प्रदेश अध्यक्ष हैं. हालांकि मौजूदा वक्त में पार्टी के दो विधायक हैं. हालांकि 2014 में पार्टी के कांग्रेस से ज्यादा 19 विधायक विधानसभा में थे. जबकि 2019 में एक विधायक था. लेकिन आने वाले वक्त में बेहतर प्रदर्शन के लिए पार्टी पूरा जोर लगा रही है.
जननायक जनता पार्टी के सामने अस्तित्व की लड़ाई: साल 2019 में बीजेपी के साथ सत्ता में आई जननायक जनता पार्टी मौजूदा वक्त में अस्तित्व की लड़ाई लड़ती दिखाई दे रही है. हालांकि पार्टी के नेता जनता के मुद्दे उठाकर खुद के वजूद को बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी पार्टी को बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत है. जननायक जनता पार्टी के 2019 में दस विधायक थे, आज उसका एक भी विधायक सदन में नहीं है. मौजूदा वक्त में पार्टी के प्रमुख नेता अजय चौटाला, पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला हैं.
जानें क्या कहते हैं पॉलिटिकल एक्सपर्ट:
बीजेपी के मुकाबले का संगठन विरोधी पार्टियों के पास नहीं: हरियाणा के मौजूदा सियासी माहौल को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट धीरेंद्र अवस्थी कहते हैं कि, “साल 2014 के बाद हरियाणा की फिजा में बीजेपी ने जिस तरह अपना वजूद बनाया, वह निश्चित है आज के दौर में और मजबूत हो रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी के मुकाबले का संगठन विरोधी पार्टियों के पास नहीं है. हालांकि नेतृत्व के मामले में बीजेपी जरूर विपक्ष से मजबूत दिखती है, लेकिन विपक्ष के पास नेताओं की कमी नहीं है. जिस तरह अब खासतौर पर कांग्रेस अपने संगठन को 2014 के बाद मजबूत कर रही है और पार्टी नेता जिन कार्यकर्ताओं को भूल बैठे थे, उनके बीच जाकर फिर से उनमें जोश भर रहे हैं. उसका कहीं न कहीं आने वाले दिनों में कांग्रेस को जरूर फायदा होगा. कांग्रेस, बीजेपी को चुनौती दे पाएगी. वे कहते हैं कि संगठन की कमी की वजह से कांग्रेस 2019 और 2024 में सत्ता के करीब आते-आते रह गई. अब पार्टी अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को मजबूत कर रही है. इसका असर भी देखने को जरूर मिलेगा.”
“कांग्रेस के पास नेतृत्व है, लेकिन पिछले चुनावों में नेताओं की आपसी खींचतान पार्टी को भारी पड़ी. अगर कांग्रेस के सभी नेता जैसे आज कई बार मंचों पर साथ दिखाई देते हैं, वैसे ही 2024 के चुनावों में भी साथ दिखते तो निश्चित तौर पर चुनावी नतीजे कुछ और हो सकते थे. हालांकि अब सभी धीरे-धीरे ही सही, एक साथ आगे बढ़ते दिख रहे हैं, इसका लाभ पार्टी को जरूर मिलेगा. जहां तक बात इनेलो और जेजेपी की है तो मौजूदा वक्त में इनेलो अच्छी स्थिति में है. पार्टी के भले ही दो विधायक हैं, लेकिन वे जनता की आवाज को उठाने में सफल दिखाई देते हैं. इनेलो भले ही बीजेपी और कांग्रेस के मुकाबले कम लगती हो, लेकिन उसका जनाधार अभी भी बरकरार है.”
कांग्रेस में संगठन की कमी: वहीं, वरिष्ठ पत्रकार व पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत सिंह कहते हैं कि, “आज के दौर में बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी है. पास न तो नेतृत्व की कमी है और न संगठन की. हरियाणा में भी देश की तरह आज के वक्त में बीजेपी मजबूत है. उसकी क्षमता पार्टी के कार्यक्रमों में साफ तौर पर दिखाई भी देती है. क्योंकि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को हमेशा तरजीह देती है और उनको क्षमता के मुताबिक आगे भी बढ़ाती है, जिससे उनमें जोश बना रहता है. जहां तक बात कांग्रेस की है तो लंबे वक्त तक देश और हरियाणा में संगठन की कमी से पार्टी को जो नुकसान हुआ, उसी का नतीजा है कि पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया. हरियाणा में 2014 के बाद अब जाकर पार्टी जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूती दे रही है.
जिसकी कमी पिछले चुनावों में साफ तौर पर दिखाई दी थी. कार्यकर्ताओं की सुध लेने से कहीं न कहीं आने वाले समय में पार्टी को उसका फायदा मिल सकता है. यानी अब कांग्रेस बीजेपी की राह पर चल पड़ी है. वे कहते हैं कि संगठन की कमी और गुटबाजी की वजह से पिछले चुनावों में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ था. अब पार्टी के नेता भी काफी हद तक संगठित दिखाई देते हैं, पार्टी में अगर सबकुछ ऐसा ही रहता है तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में वह बीजेपी को कड़ी चुनौती दे सकती है.
जहां तक बात इनेलो और जेजेपी की है तो बड़ी बात यह है कि एक क्षेत्रीय दल के तौर पर इनेलो आज भी हरियाणा में अपना वजूद बचाए हुए है. कई विपरीत हालातों के बावजूद पार्टी के न सिर्फ आज भी दो विधायक हैं, बल्कि लोगों के बीच उसकी अपनी अलग पहचान बरकरार है. वर्तमान में जननायक जनता पार्टी को अपना वजूद बचाना सबसे बड़ी चुनौती है, वह आगे कैसे बढ़ती है यह देखने वाली बात है.”