सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू का विवादित बयान: देश में लोकतंत्र को बताया सबसे बड़ा दुश्मन, तानाशाही की वकालत
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने देश में लोकतंत्र की आलोचना करते हुए आधुनिक तानाशाही की वकालत की है। उन्होंने कहा कि 90 फीसदी लोग वोट देने लायक नहीं हैं।
अपने बेबाक और तीखे बयानों के लिए अक्सर सुर्खियों में रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस बार उन्होंने देश में ‘डिक्टेटरशिप’ (तानाशाही) की वकालत करते हुए लोकतंत्र को ही भारत का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया है। पूर्व जज ने यहां तक कह दिया कि देश के 90 प्रतिशत लोग वोट देने के योग्य नहीं हैं और उनसे मतदान का अधिकार छीन लेना चाहिए। काटजू के मुताबिक, देश में अधिकतर लोग जाति और धर्म के नाम पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आम जनता को वोटिंग का अधिकार नहीं होना चाहिए।
🗳️ ‘90% लोगों की खोपड़ी में जातिवाद और सांप्रदायिकता का गोबर भरा है’; वोट चोरी के सवाल पर दिया चौंकाने वाला जवाब
जाति-धर्म आधारित वोटिंग पैटर्न पर पूर्व जज की खरी-खोटी:
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लोकतन्त्र पर तीखा हमला: 80 वर्षीय सेवानिवृत्त जज ने देश की चुनावी प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा, ‘देश का सबसे बड़ा दुश्मन लोकतंत्र ही है। जब मैं यह बात कहता हूं तो लोग नाराज हो जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि देश का 90 फीसदी आदमी जाहिल है। जातिवाद और सांप्रदायिकता, जिसे मैं गोबर कहता हूं, उसकी खोपड़ी में भरा हुआ है।’
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उम्मीदवार के गुण-दोष की अनदेखी: उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति वोट डालने जाता है, तो वह यह नहीं देखता कि उम्मीदवार अच्छा है या बुरा, पढ़ा-लिखा है या क्रिमिनल, और वह जनता के भले के लिए काम करेगा या नहीं। वह सिर्फ एक भेड़-बकरी की तरह अपनी जाति-बिरादरी को देखकर वोट करता है।
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‘और वोट चोरी हो जाने चाहिए’: जब उनसे ज्ञानेश कुमार और 13 करोड़ वोट चोरी होने के चल रहे आरोपों के बारे में पूछा गया, तो काटजू ने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा, ‘मुझसे पूछा गया तो मैंने कहा कि और वोट चोरी हो जाएं। तुम लोग वोट देने लायक ही नहीं हो। इस मुल्क में लोकतंत्र नहीं चल सकता है।’
🇹🇷 विकल्प के रूप में ‘मॉडर्न माइंडेड डिक्टेटरशिप’ की मांग; तुर्की के मुस्तफा कमाल का दिया उदाहरण
तानाशाही के प्रकार और आधुनिकीकरण पर विचार:
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तुर्की के शासक का हवाला: यह पूछे जाने पर कि यदि लोकतंत्र नहीं, तो फिर इसका विकल्प क्या है? इसके जवाब में पूर्व जज ने दो तरह की तानाशाही का जिक्र किया और एक की पुरजोर वकालत की। उन्होंने टर्की (तुर्की) के नेता मुस्तफा कमाल पाशा का उदाहरण दिया, जिन्होंने 1920 के दशक में सेना की ताकत से सत्ता अपने हाथ में ली थी और देश को आगे बढ़ाने के लिए रूढ़िवादी परंपराओं को कड़ाई से प्रतिबंधित कर दिया था।
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बंदूक के बल पर सुधार की बात: काटजू ने कहा, ‘यहां के लोगों को आप समझा नहीं सकते हैं। यहां तो बंदूक रखना पड़ेगा कि तुमको आधुनिक होना ही पड़ेगा, नहीं तो गोली मार दूंगा। तब जाकर अक्ल आएगी। जाहिल और जंगली किस्म के 90 फीसदी लोगों को कोई और नहीं समझा सकता।’
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जिज्ञासा और तुलना: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पाकिस्तान के जनरल जिया-उल-हक जैसी देश को पीछे ले जाने वाली तानाशाही के नहीं, बल्कि तुर्की की तर्ज पर देश को आधुनिक बनाने वाली ‘मॉडर्न माइंडेड डिक्टेटरशिप’ के पक्षधर हैं।