IMF की चेतावनी: अमेरिका-ईरान-इजराइल संघर्ष से वैश्विक अर्थव्यवस्था को खतरा

IMF ने चेताया: अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध से चरमरा सकती है दुनिया की अर्थव्यवस्था। होर्मूज स्ट्रेट पर संकट से कच्चा तेल $115 पार, गरीब देशों पर बढ़ेगी महंगाई की मार।

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को अब लगभग एक महीना हो गया है. इस दौरान, कई देशों में महंगाई तेजी से बढ़ी है. ज्यादातर देशों में गैस और तेल की सप्लाई को लेकर भारी उथल-पुथल मची हुई है. इस संघर्ष की वजह से, छोटे देशों की तो बात ही छोड़िए, बड़े-बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी हिल गई हैं. इन सबके बीच, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने अब एक बड़ी चेतावनी जारी की है. IMF ने कहा है कि अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा है. आने वाले समय में यह असर और भी गहरा हो सकता है. यह संघर्ष उन कई अर्थव्यवस्थाओं की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है, जो अभी-अभी पिछले संकटों से उबरना शुरू ही हुई थीं.

होर्मूज स्ट्रेट की वजह से चरमराई पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था

IMF के अर्थशास्त्रियों टोबियास एड्रियन और जिहाद अजौर द्वारा जारी एक विस्तृत विश्लेषण में कहा है कि यह संघर्ष पहले ही वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है. ऊर्जा, खाद्य और वित्तीय बाजारों के माध्यम से इसका असर तेजी से फैल रहा है. इस संकट का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर देखा जा रहा है. खास तौर पर, होर्मूज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता ने वैश्विक सप्लाई चेन को खतरे में डाल दिया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि होर्मूज दुनिया की लगभग 25 से 30 प्रतिशत तेल सप्लाई और लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के लिए एक अहम रास्ता है. इसके बंद होने के खतरे से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, और ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है.

विकासशील और गरीब देशों पर सबसे ज्यादा मार पड़ेगी

IMF का कहना है कि इस संकट का असर सभी देशों पर एक जैसा नहीं पड़ेगा. विकासशील और गरीब देश, जो ऊर्जा आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, उन पर इसका सबसे बुरा असर पड़ने की आशंका है. खास तौर पर, एशिया और अफ्रीका के जिन देशों के पास वित्तीय संसाधन सीमित हैं, उन्हें ईंधन की बढ़ती कीमतों और सप्लाई में रुकावटों की वजह से गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है. इसके विपरीत, तेल और गैस का निर्यात करने वाले देशों को इस स्थिति से कुछ हद तक फायदा हो सकता है. ऊर्जा संकट के दुष्परिणाम अब खाद्य क्षेत्र में भी दिखाई देने लगे हैं; ईंधन की बढ़ती कीमतों और खाड़ी देशों से उर्वरकों की सप्लाई में रुकावटों की वजह से कृषि उत्पादन की लागत बढ़ रही है. इसका असर भविष्य में फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है और इससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है.

बढ़ती खाद्य कीमतें भी एक बड़ा संकट

IMF ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति उन देशों के लिए विशेष रूप से गंभीर हो सकती है, जहां लोगों की आय का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है. वास्तव में, कम आय वाले देशों में, परिवार अपने बजट का लगभग 36 प्रतिशत भोजन की चीजों पर खर्च करते हैं, जबकि विकसित देशों में यह आँकड़ा लगभग 9 प्रतिशत है. नतीजतन, भोजन की कीमतों में वृद्धि इन देशों में सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकती है. IMF ने कहा कि यदि स्थिति बिगड़ती है, तो कई देशों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है.

रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि यह संकट वैश्विक स्तर पर महंगाई को फिर से बढ़ा सकता है और आर्थिक विकास को धीमा कर सकता है. कीमतों में वृद्धि की लंबी अवधि महंगाई की उम्मीदों को अस्थिर कर सकती है, जिससे वेतन और कीमतों के बढ़ते चक्र को शुरू होने का जोखिम बढ़ जाता है.

IMF का साफ संदेश

IMF के अनुसार, इस संकट का अंतिम प्रभाव संघर्ष की अवधि पर निर्भर करेगा. अगर यह कम समय तक रहता है, तो नुकसान सीमित हो सकता है. हालांकि, अगर यह लंबे समय तक जारी रहता है या बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक गंभीर झटका लग सकता है. फिलहाल, IMF ने स्पष्ट किया है कि वह स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है और अपनी आने वाली रिपोर्टों में एक विस्तृत आकलन पेश करेगा. IMF का संदेश साफ है कि यह संकट भले ही क्षेत्रीय हो, लेकिन इसके आर्थिक प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जाएंगे, और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को पर इसका ज्यादा असर होगा.

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