Aayshna Kalyan Post: ‘तिलक’ और पारिवारिक संस्कार; आयशना कल्याण की पोस्ट ने जीता सबका दिल

हरियाणा विस अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण की बेटी आयशना कल्याण ने साझा किए बचपन के संस्कार। जानें 'तिलक' का धार्मिक महत्व और कैसे पीढ़ियों से संभली है हमारी विरासत।

चंडीगढ़ : बेटियां जहां मां का प्रतिभिंब होती हैं वहीं परिवार की शान भी होती है।हाल ही में सोशल मीडिया पर हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण के बेटी आयशना कल्याण द्वारा की एक पोस्ट से पारिवारिक संस्कारों के निर्वाह का प्रतिबिंब झलकता है।

आयशना कल्याण द्वारा की  पोस्ट  में लिखा गया है कि बचपन में नाना-नानी के घर में बितायी गर्मियों-सर्दियों की छुट्टियों का एक आम नज़ारा होता था घर आये अतिथि या रिश्तेदार को विदा करते समय उनका ‘तिलक’ करने की प्रथा …।मुझ जैसे छोटे बच्चे के लिए यह जितना आश्चर्यजनक था, उतना ही मार्मिक भी। उस पूरी प्रक्रिया में विदाई की अफ़रा-तफ़री में ठहराव आ जाता था। बड़े अपनी गति को धीमा कर एक-दूसरे को क्षण-भर ही सही मगर आँख-भर देखते, आशीर्वाद लेते और मेरा सबसे पसंदीदा अंश – बड़ों से कुछ शगन या घर के बने स्वादिष्ट खाने के सामान से भरा पैकेट का मिलना।

आयशना कल्याण द्वारा की  पोस्ट  में लिखा गया है कि खैर, आज का विषय है ‘तिलक’ .. जैसे-जैसे हम बड़े हुए, पूछताछ करने पर बड़ों ने बताया कि हमारी संस्कृति में ‘तिलक’ शुभता व सम्मान का प्रतीक माना जाता है। माथे के बीच तिलक लगाने की जगह को ‘आज्ञा चक्र’ कहते हैं जो कि कि ध्यान और सोच से जुड़ा है। तिलक के कई प्रकार और नियम हैं ~ अंगूठे से तिलक को तर्जनी से पितरों, मध्यमा से स्वयं तथा अनामिका से देवताओं को।

आयशना कल्याण द्वारा की  पोस्ट  में लिखा गया है कि मेरी माँ ने यह प्रथा अपने हरियाणवी ससुराल में आज तक कायम रखी है। उनकी गैर-मौजूदगी में भी हमें निर्देश ज़रूर देती है कि किस विधि से कैसा तिलक करना है। महाराष्ट्र में पुरुषों को केवल कुमकुम तथा स्त्रियों को कुमकुम के साथ-साथ हल्दी का भी तिलक लगाते हैं। कुमकुम लक्ष्मी जी का प्रतीक है और हल्दी विष्णु जी का ….छोटी-छोटी रीतियां और पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ाते रहना.. ऐसे ही तो हमारी विरासत अस्तित्वमयी तथा संपन्न रहती है।

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