ईरान ने डोनाल्ड ट्रंप को दिया बड़ा झटका, 2029 तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद रखने का ऐलान

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर। तेहरान ने डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल 2029 में समाप्त होने तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज न खोलने और समझौते से इनकार का ऐलान किया।

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लाख कोशिशों के बावजूद तेहरान वाशिंग्टन के सामने झुकने को तैयार नहीं. ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए ईरान पर लगातार दबाव बना रहे हैं. इसी को लेकर अब ईरान ने ट्रंप को बड़ा झटका दिया है. ईरान की तरफ से कहा जा रहा है कि साल 2029 यानी जब तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल समाप्त नहीं होता, तब तक वो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नहीं खोलेगा.

ईरान ने सोमवार को ट्रंप प्रशासन के साथ किसी भी भविष्य की बातचीत से इनकार कर दिया है. ईरान ने साफ कहा है कि वह 20 जनवरी, 2029 को अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने तक इंतजार करेगा. ईरान की इस बात से अमेरिका के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है. ईरान का कहना है कि वो 2029 तक इंतजार करने के लिए तैयार हैं, लेकिन ट्रंप के सामने किसी भी कीमत पर झुककर कोई समझौता नहीं करेगा.

2029 को खत्म होगा ट्रंप का कार्यकाल

ईरानी मीडिया और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ के सलाहकार माजिज शेकरी की ओर से किए गए एक बयान के मुताबिक, तेहरान अब ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने तक अपनी मौजूदा रणनीति जारी रखेगा. ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल 20 जनवरी 2029 को खत्म होगा. इसके साथ ही ईरान ने अपनी 3 पुरानी शर्तें भी दोहराईं, जिससे ट्रंप प्रशासन मुश्किल में पड़ गया है.

ट्रंप से समझौते की उम्मीद नहीं

ईरानी संसद अध्यक्ष गालिबाफ के वरिष्ठ सलाहकार माजिद शाकेरी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करते हुए तेहरान का रुख साफ किया. उन्होंने कहा, ट्रंप हमारे साथ किसी भी तरह के समझौते तक नहीं पहुंच पाएंगे. हम 20 जनवरी 2029 तक इंतजार करेंगे और हम उनका कार्यकाल खत्म होने तक इसी तरह बने रहेंगे.

ईरान का रुख साफ

उन्होंने कहा कि ईरान का रास्ता न तो सीधी जंग है और न ही तत्काल समझौता, बल्कि ऐसी स्थिति बनाए रखना है जिसमें युद्ध भी न हो और शांति भी पूरी तरह स्थापित न हो. उन्होंने कहा कि इस माहौल में अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की सार्वजनिक रूप से पुष्टि करना सरासर बेवकूफी होगी. उन्होंने कहा किअभी हमारे लिए सबसे बेहतरीन और जीतने वाली रणनीति यही है कि हम इनकार करें, अनिश्चितता बनाए रखें और रणनीतिक धैर्य दिखाएं.

ईरान ने रखी बड़ी शर्तें

ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए अपनी कुछ प्रमुख शर्तें भी रखी हैं. इनमें करीब 300 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग, जब्त की गई संपत्तियों की रिहाई और अमेरिकी सेनाओं की वापसी शामिल है. तेहरान का कहना है कि जब तक अमेरिका इन मांगों को स्वीकार नहीं करता, तब तक बातचीत आगे बढ़ाना संभव नहीं है. ईरान ने युद्ध के दौरान हुए नुकसान और कथित समझौते के उल्लंघन के लिए भी मुआवजे की मांग की है. तेहरान ने होर्मुज को फिर से खोलने को अपनी मांगों की स्वीकृति से जोड़ा है.

बातचीत नहीं, सिर्फ संदेशों का आदान-प्रदान

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भी एक दिन पहले कहा था कि फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं चल रही है. हालांकि, दोनों देशों के बीच मध्यस्थों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है. अरागची के मुताबिक, कुछ देश दोनों पक्षों के बीच दोबारा बातचीत शुरू कराने के लिए माहौल तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन ईरान का कहना है कि अमेरिका जब तक समझौते के उल्लंघन को रोकने और उसके नुकसान की भरपाई करने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक औपचारिक बातचीत शुरू नहीं की जाएगी.

शर्तें न मानने तक बंद रहगा स्ट्रेट ऑफ होर्मूज

बातचीत के साथ-साथ ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मूज को लेकर भी अपना रुख सख्त रखा है. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा है कि अमेरिका की ओर से उसकी सभी शर्तें स्वीकार किए जाने तक स्ट्रेट ऑफ होर्मूज को नहीं खोला जाएगा. गार्ड्स के प्रवक्ता हुसैन मोहेबी ने कहा कि फिलहाल ईरान की रणनीति स्ट्रेट ऑफ होर्मूज को तब तक बंद रखने की है, जब तक अमेरिका उसकी सभी मांगों को स्वीकार नहीं करता. उन्होंने इसे अब सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि युद्ध का मैदान बताया.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अहम समुद्री मार्ग

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज महज एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि ये पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ की हड्डी माना जाता है. दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले कुल कच्चे तेल का करीब पांचवां हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देश इसी रास्ते के जरिए अपने टैंकरों को एशिया, यूरोप और अमेरिका भेजते हैं.

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