कभी 850 एकड़ में फैली थी एशिया की शान, जानिए क्यों और कैसे बंद हुई पिंजौर की एचएमटी फैक्ट्री
चंडीगढ़ की ऐतिहासिक सरकारी प्रेस और पिंजौर की HMT ट्रैक्टर फैक्ट्री की कहानी। जानिए कैसे समय के साथ बदल गया इनका स्वरूप।
पंचकूला: सिटी ब्यूटीफुल के बसने के साथ चंडीगढ़ और पंचकूला में ऐसी कई संस्थाएं और औद्योगिक इकाइयां विकसित हुईं, जिन्होंने उत्तर भारत के विकास में अहम भूमिका निभाई. इनमें चंडीगढ़ के सेक्टर-18 स्थित सरकारी प्रिंटिंग एवं स्टेशनरी प्रेस और पंचकूला के पिंजौर स्थित हिंदुस्तान मशीन टूल्स (HMT) की औद्योगिक इकाइयां खास रही हैं. एक ओर सरकारी प्रेस में वर्षों तक सरकारी दस्तावेज, किताबें, प्रश्नपत्र और राजपत्र छपते रहे. वहीं, दूसरी ओर HMT ने ट्रैक्टर निर्माण के जरिए कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने में योगदान दिया. समय बदला तो दोनों जगहों का स्वरूप भी बदल गया.
1953 में शुरू हुआ सरकारी प्रेस का ऐतिहासिक सफर: दरअसल, चंडीगढ़ के सेक्टर-18 स्थित सरकारी प्रिंटिंग एवं स्टेशनरी प्रेस की इमारत का निर्माण वर्ष 1953 में शुरू हुआ था. इसे चंडीगढ़ की कैपिटल प्रोजेक्ट टीम से जुड़े ब्रिटिश वास्तुकार एडविन मैक्सवेल फ्राई ने डिजाइन किया था. आधुनिक वास्तुकला के अनुरूप तैयार की गई इस इमारत का काम वर्ष 1956 में पूरा हुआ. इसी वर्ष केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के प्रिंटिंग एवं स्टेशनरी विभाग को 72 कमरों वाली यह इमारत सौंपी गई थी.
जर्मनी से आई मशीनों से होता था बड़ा काम: प्रेस की स्थापना के समय यहां जर्मनी से आयातित मशीनें लगाई गई थीं. शुरुआती दौर में यह केवल चंडीगढ़ प्रशासन के काम तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास के राज्यों और केंद्र सरकार से जुड़े विभिन्न कार्य भी यहां किए जाते थे. 1970 के दशक की शुरुआत में यहां करीब 1800 कर्मचारी कार्यरत थे. उस दौर में प्रेस सरकारी कामकाज के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में काम करता था.
आधुनिक वास्तुकला का अनूठा उदाहरण: सेक्टर-18 की यह इमारत आधुनिक वास्तुकला का उदाहरण मानी जाती है. इमारत में कांच का अग्रभाग, खुली ईंटों का काम और धूप व गर्मी से बचाव के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए सनशेड लगाए गए थे. इसकी बनावट उस समय की आधुनिक वास्तु सोच को दर्शाती थी. इमारत केवल सरकारी कामकाज का केंद्र नहीं थी, बल्कि चंडीगढ़ के शुरुआती स्थापत्य इतिहास का भी हिस्सा बनी.
यहां छपते थे राजपत्र से लेकर प्रश्नपत्र तक: सरकारी प्रेस में ऑफसेट प्रिंटिंग के जरिए फॉर्म, किताबें और प्रश्नपत्र तैयार किए जाते थे. पुस्तकों और विवरणिकाओं की रंगीन छपाई के साथ राजपत्र, बाइंडिंग और कंपोजिंग का काम भी होता था. चंडीगढ़ प्रशासन के विभिन्न विभागों के मुद्रण कार्य के अलावा स्कूल-कॉलेज की पत्रिकाएं, प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिकाएं भी यहां तैयार की जाती थीं.
चुनाव से विधानसभा तक के दस्तावेजों की छपाई: प्रेस का काम केवल सामान्य सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं था. पंजाब, चंडीगढ़ प्रशासन और दिल्ली नगर निगम के लिए मतपत्रों की छपाई भी यहां की जाती थी. पंजाब विधानसभा सचिवालय के विधेयकों तथा तारांकित और गैर-तारांकित प्रश्नों की छपाई का काम भी प्रेस से जुड़ा रहा. उत्तरी क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दिल्ली से जुड़े बीबीएमबी के मुद्रण कार्य भी यहां किए जाते थे.
अब प्रेस का मूल कामकाज हो चुका है बंद: समय के साथ तकनीक और सरकारी कामकाज के तरीकों में बदलाव आया. इसका असर सेक्टर-18 स्थित सरकारी प्रेस पर भी पड़ा. वर्तमान में इस इमारत में प्रिंटिंग एवं स्टेशनरी का पूरा पुराना कामकाज बंद है. इमारत में अब भारतीय वायु सेना का एक म्यूजियम, कोऑपरेटिव सोसाइटीज से संबंधित कामकाज, सरकारी मकानों की अलॉटमेंट, गजट से जुड़े कार्य और अन्य विभागों के कार्यालय संचालित हो रहे हैं.
ऑनलाइन व्यवस्था ने बदला स्टेशनरी का तरीका: सरकारी विभागों में डिजिटल माध्यम के बढ़ते इस्तेमाल के साथ स्टेशनरी और अन्य सामग्री उपलब्ध कराने के तरीकों में भी बदलाव आया है. चंडीगढ़ प्रशासन अब जेम पोर्टल और ऑनलाइन माध्यम से विभिन्न स्टेशनरी वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता है. इस बदलाव ने पुराने दौर की सरकारी प्रिंटिंग व्यवस्था को काफी पीछे छोड़ दिया है.
पिंजौर में HMT ने रखी औद्योगिक विकास की नींव: पंचकूला के पिंजौर की कहानी भी औद्योगिक विकास से जुड़ी है. हिंदुस्तान मशीन टूल्स की स्थापना भारत सरकार ने वर्ष 1953 में बेंगलुरु में की थी. इसके बाद वर्ष 1963 में पिंजौर में HMT की तीसरी मशीन टूल इकाई स्थापित की गई. फिर इसी परिसर में ट्रैक्टर निर्माण की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया और वर्ष 1971 में ट्रैक्टर यूनिट ने उत्पादन शुरू किया.
चेकोस्लोवाकिया की तकनीक से शुरू हुआ ट्रैक्टर उत्पादन: पिंजौर प्लांट में ट्रैक्टर उत्पादन चेकोस्लोवाकिया की कंपनी ‘मोटकोव’ के तकनीकी सहयोग से शुरू हुआ था. यहां जेटोर 2511 और 25 हॉर्स पावर तकनीक पर आधारित ट्रैक्टरों का उत्पादन किया गया. हरित क्रांति के दौर में कृषि क्षेत्र में मशीनों की जरूरत बढ़ी और ट्रैक्टरों ने खेती को आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
1999 में उत्पादन ने बनाया रिकॉर्ड: HMT ट्रैक्टरों के लिए पिंजौर प्लांट का दौर लंबे समय तक उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा. वर्ष 1999 में कंपनी ने सालाना 19,500 ट्रैक्टर बनाने का अपना सर्वोच्च रिकॉर्ड दर्ज किया. उस समय पिंजौर का HMT परिसर केवल एक फैक्ट्री नहीं था, बल्कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों और उनके परिवारों के जीवन से जुड़ा पूरा औद्योगिक क्षेत्र था.
850 एकड़ के परिसर में बसती थी अलग दुनिया: HMT में वर्ष 1993 से काम कर चुके पुराने कर्मचारी रामवीर पांचाल बताते हैं कि, “पिंजौर में HMT का परिसर करीब साढ़े 850 एकड़ में फैला था. करीब 200 एकड़ में HMT की ट्रैक्टर फैक्ट्री थी और टूल्स यूनिट उसके बिल्कुल पास थी. परिसर में कर्मचारियों के रहने के लिए HMT कॉलोनी भी थी, जहां करीब 1100 मकान बनाए गए थे.कॉलोनी में करीब एक हजार क्वार्टर कर्मचारियों और 100 क्वार्टर अधिकारियों के लिए अलग से बनाए गए थे. कभी इन मकानों में हजारों लोग रहते थे. अब स्थिति बदल चुकी है. ज्यादातर क्वार्टर जर्जर हालत में हैं और कुछ मकानों में ही कर्मचारी रह रहे हैं, जो टूल्स यूनिट या दूसरे विभागों में कार्यरत हैं.”
कृषि विकास से जुड़ी HMT ट्रैक्टर की कहानी: रामवीर पांचाल ने आगे कहा कि, “जिस दौर में देश को अनाज के लिए बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, उस समय HMT की स्थापना और ट्रैक्टर निर्माण की शुरुआत हुई. खेती का उत्पादन बढ़ाने में ट्रैक्टरों की बड़ी भूमिका रही और पिंजौर में तेजी से ट्रैक्टर तैयार किए जाते थे.फैक्ट्री ने लंबे समय तक जनहित के साथ आर्थिक रूप से भी बेहतर प्रदर्शन किया.”
2000 के बाद घटने लगा उत्पादन: साल 2000 के बाद ट्रैक्टर बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी. महिंद्रा, सोनालिका और विदेशी निजी कंपनियों की मौजूदगी के बीच HMT को बदलते बाजार के अनुरूप खुद को बनाए रखने की चुनौती बढ़ती गई. मार्केटिंग रणनीति की कमी, बदलती बाजार परिस्थितियों और डीलर क्रेडिट से जुड़ी नीतियों के चलते कंपनी की स्थिति कमजोर होती गई. उत्पादन में गिरावट के साथ घाटा भी बढ़ता गया. साल 2013 में केंद्र सरकार ने HMT के लिए 1083 करोड़ रुपये का पुनरुद्धार पैकेज मंजूर किया था. इसके बावजूद कंपनी की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका. वर्ष 2015-16 तक उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज होती रही और आर्थिक चुनौतियां बढ़ती गईं. आखिरकार दिसंबर 2016 में पिंजौर की ऐतिहासिक ट्रैक्टर फैक्ट्री पूरी तरह बंद हो गई.
फैक्ट्री में पांच प्रमुख विभाग करते थे काम: पिंजौर की HMT ट्रैक्टर फैक्ट्री में उत्पादन की पूरी प्रक्रिया कई प्रमुख विभागों में बंटी हुई थी. फाउंड्री विभाग में पुर्जों की ढलाई होती थी. हेवी मशीन शॉप में हाउसिंग और कवर की मशीनिंग की जाती थी. इंजन शॉप में कैमशाफ्ट और कनेक्टिंग रॉड बनाए जाते थे. इसके अलावा लाइट मशीन शॉप और ट्रैक्टर असेंबलिंग विभाग उत्पादन प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से थे.
आज जमीन पर दिखता है बदले दौर का असर: कभी हजारों कर्मचारियों की गतिविधियों और मशीनों की आवाज से भरा HMT परिसर अब अपने पुराने स्वरूप में नहीं है. करीब साढ़े आठ सौ एकड़ का बड़ा हिस्सा आज वीरान पड़ा है. हालांकि हरियाणा सरकार की ओर से करीब 400 एकड़ जमीन पर सेब एवं सब्जी मंडी का निर्माण किया गया है. ऐसे में पिंजौर की औद्योगिक पहचान अब धीरे-धीरे नए उपयोग और नए दौर में बदल रही है.
दो जगहों की कहानी, एक जैसा बदलाव: चंडीगढ़ की सरकारी प्रेस और पिंजौर की HMT फैक्ट्री की कहानियां अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हैं, लेकिन दोनों में समय के बदलाव की एक समान तस्वीर दिखाई देती है. एक जगह कभी सरकारी दस्तावेजों और पुस्तकों की छपाई का बड़ा केंद्र थी, तो दूसरी जगह कृषि क्षेत्र के लिए ट्रैक्टर तैयार होते थे. तकनीक, प्रशासनिक व्यवस्था और बाजार की बदलती जरूरतों ने दोनों के पुराने स्वरूप को बदल दिया. आज इन जगहों पर मौजूद इमारतें और परिसर उस औद्योगिक दौर की याद दिलाते हैं, जब मशीनों और संस्थानों ने क्षेत्र के विकास की कहानी लिखी थी.