क्या इजराइल में होगी नेतन्याहू और आइजनकोट की सरकार? व्हाइट हाउस की मध्यस्थता पर टिकी नजरें

इजराइल में चुनाव परिणाम के बाद सरकार गठन को लेकर पेच फंस गया है। बेंजामिन नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच गठबंधन और अमेरिकी दबाव पर जानिए पूरी खबर।

इजराइल में हालिया चुनावी नतीजे सामने आने के बाद अब देश की सत्ता और प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर पेच कसता जा रहा है। वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, न तो कार्यवाहक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत है और न ही उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी गादी आइजनकोट के पास जादुई आंकड़े हैं।

हालाँकि, आइजनकोट के पास कुछ अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने का विकल्प खुला जरूर है, लेकिन इसकी व्यावहारिक गुंजाइश बेहद कम नजर आ रही है। ऐसे में इजराइल के इस सियासी संकट से निपटने के लिए अब पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिका की ओर टिकी हुई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस पर्दे के पीछे नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच सुलह कराने के प्रयासों में जुटा है, क्योंकि अमेरिका चाहता है कि इजराइल में एक मजबूत दक्षिणपंथी (Right Wing) सरकार बने और अरब पार्टियों के सीधे दखल से वहां का समीकरण खराब न हो।

🤝 दोनों दिग्गज नेताओं के शुरुआती संकेत और विचारधारा की समानता

राजनीतिक हालात के बीच दोनों प्रमुख नेताओं की तरफ से कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जो गठबंधन की संभावनाओं को बल देते हैं:

  • बेंजामिन नेतन्याहू का रुख: इजराइल के मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया है कि देश को ईरान के मंडराते खतरे से सुरक्षित रखने के लिए एक मजबूत दक्षिणपंथी सरकार का होना बेहद जरूरी है।

  • गादी आइजनकोट का स्टैंड: वहीं, पूर्व आईडीएफ चीफ गादी आइजनकोट ने अरब पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि देश की सुरक्षा और सेवा के लिए केवल एक यहूदी नेतृत्व वाली सरकार ही बनाई जानी चाहिए।

🇺🇸 क्या दोनों नेताओं के बीच होगा गठबंधन? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा प्रभाव

इजराइल के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि नेतन्याहू और आइजनकोट हाथ मिला सकते हैं। इसके पीछे दो मुख्य वजहें मानी जा रही हैं— पहली, दोनों नेताओं की विचारधारा में काफी हद तक समानता होना और दूसरी, अमेरिका का कूटनीतिक दबाव।

मौजूदा वैश्विक और मध्य पूर्व (Middle East) के हालात को देखते हुए इजराइल के लिए अमेरिका, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का खुलकर विरोध करना मुमकिन नहीं है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भी अमेरिकी दखल के चलते चुनावी पासा पलट गया था, जिसके बाद से इजराइल की घरेलू राजनीति पर अमेरिकी प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।

🗳️ दोबारा चुनाव में जाने से आइजनकोट को हो सकता है भारी नुकसान

यदि इजराइल में किसी भी तरह सरकार का गठन नहीं हो पाता है, तो देश को एक बार फिर मध्यावधि चुनाव (Re-election) की ओर धकेलना पड़ सकता है।

  • राजनीतिक जोखिम: जानकारों का मानना है कि दोबारा चुनाव में जाना गादी आइजनकोट के राजनीतिक करियर के लिए घातक साबित हो सकता है, जबकि चुनाव के इस असमंजस के बीच बेंजामिन नेतन्याहू अपनी राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत कर सकते हैं।

  • अरब पार्टियों का उभार: इस बीच, चुनाव में अरब पार्टियों के अप्रत्याशित उभार ने इजराइल के यहूदी नागरिकों को सकते में डाल दिया है। इतिहास में यह पहला मौका है जब इजराइली राजनीति में अरब पार्टियों की स्थिति इतनी मजबूत हुई है।

नेतन्याहू पहले ही अरब पार्टियों पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगा चुके हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा इजराइल की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बनने वाला है।

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