क्रास-सब्सिडी और चेरी-पिकिंग को लेकर बढ़ी चिंता, विधानसभा सत्र में गूंजेगा मुद्दा
हरियाणा में गुरुग्राम और नूंह में निजी बिजली कंपनी को लाइसेंस देने की सिफारिश के खिलाफ बिजली कर्मचारियों ने मोर्चा खोल दिया है।
चंडीगढ़ : हरियाणा में गुरुग्राम और नूंह के बिजली वितरण क्षेत्र में निजी कंपनी के प्रवेश की संभावित राह खुलने के साथ ही राजनीतिक और कर्मचारी विरोध तेज हो गया है। हरियाणा विद्युत नियामक आयोग के समक्ष चल रही प्रक्रिया में इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देने की विशेषज्ञ समिति की सिफारिश ने बिजली कर्मचारियों और अभियंताओं के संगठनों को लामबंद कर दिया है।
संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने इस मुद्दे को केवल दो जिलों का मामला न मानते हुए इसे प्रदेश के ग्रामीण, कृषि और घरेलू बिजली उपभोक्ताओं के हितों से जोड़ दिया है।इसी विरोध के तहत रविवार को प्रदेशभर में बिजली कर्मचारी संगठनों ने मंत्रियों और विधायकों को ज्ञापन सौंपे।
संगठन सभी मंत्रियों समेत प्रदेश के 90 विधायकों से मांग कर रहे हैं कि मौजूदा विधानसभा मानसून सत्र में इस मुद्दे को सदन में उठाया जाए। संगठनों का तर्क है कि निजी कंपनी को समानांतर वितरण लाइसेंस मिलने से बिजली क्षेत्र के मौजूदा क्रॉस-सब्सिडी मॉडल पर गंभीर असर पड़ सकता है।
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कर्मचारियों से कहा—“रिकॉर्ड निकलवा कर देख लो, पॉइंट वाइज आपके साथ मिलूंगा”
बिजली कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल ने ऊर्जा मंत्री अनिल विज को भी ज्ञापन सौंपा। इस दौरान विज ने कर्मचारियों के साथ बेबाकी से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि बतौर मंत्री वह कर्मचारियों के साथ हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि रिकॉर्ड निकलवाकर देख लिया जाए, वह बिंदुवार कर्मचारियों के साथ खड़े मिलेंगे।
ऊर्जा मंत्री के इस बयान ने पूरे विवाद को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बना दिया है। एक ओर नियामक आयोग की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार के ही ऊर्जा विभाग के मंत्री का कर्मचारियों के पक्ष में खुलकर सामने आना आने वाले विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को अधिक धार दे सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
गुरुग्राम और नूंह राजस्व जिलों में फिलहाल बिजली वितरण का काम दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम यानी डीएचबीवीएन के पास है। इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड ने इन क्षेत्रों में समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस हासिल करने के लिए हरियाणा विद्युत नियामक आयोग में याचिका दायर की है।
कंपनी का गठन 6 जून 2025 को हुआ था। यानी बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाली कंपनी अपेक्षाकृत नई है। कंपनी ने अपने प्रस्ताव में पांच वर्षों के दौरान करीब 4,716-4,717 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश की योजना पेश की है।
प्रस्तावित इक्विटी करीब 1,415 करोड़ रुपये बताई गई है, जबकि कर्मचारियों के संगठनों ने कंपनी की मौजूदा चुकता पूंजी करीब एक करोड़ रुपये होने पर सवाल उठाए हैं।कर्मचारी संगठन इसी आधार पर कंपनी की पूंजी क्षमता, साख योग्यता और बिजली वितरण के अनुभव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञ समिति ने दी लाइसेंस की सिफारिश, अंतिम फैसला अभी एचईआरसी के हाथ में
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी आलोक निगम की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने इलेवन पावर के आवेदन का परीक्षण करने के बाद लाइसेंस देने की सिफारिश की है। समिति के अनुसार आवेदन को खारिज करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिश अंतिम निर्णय नहीं है। समानांतर वितरण लाइसेंस देने का अंतिम अधिकार हरियाणा विद्युत नियामक आयोग के पास है। यही वजह है कि बिजली कर्मचारी संगठन अब राजनीतिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ आयोग की प्रक्रिया पर भी सवाल उठा रहे हैं। संगठनों की प्रमुख मांगों में विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करना, सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना और उपभोक्ता हितों की स्पष्ट सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है।
सबसे बड़ा सवाल ‘चेरी-पिकिंग’ का
विरोध का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि निजी कंपनी कहीं केवल अधिक राजस्व देने वाले औद्योगिक, वाणिज्यिक और बड़े आवासीय उपभोक्ताओं को अपने नेटवर्क से जोड़ने तक सीमित न रह जाए। बिजली कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यदि निजी कंपनी मुख्य रूप से ऐसे उपभोक्ताओं को चुनती है जहां बिजली की खपत और राजस्व अधिक है, तो यह ‘चेरी-पिकिंग’ की स्थिति पैदा कर सकता है।
इसके विपरीत ग्रामीण, कृषि और कम भुगतान करने वाले घरेलू उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी सरकारी वितरण कंपनी पर बनी रह सकती है यही वह बिंदु है जहां पूरा विवाद केवल निजी बनाम सरकारी बिजली वितरण का नहीं रह जाता, बल्कि क्रॉस-सब्सिडी और उपभोक्ताओं के बीच लागत के बंटवारे का मुद्दा बन जाता है।
गुरुग्राम से मिलने वाला राजस्व बना चिंता का केंद्र
बिजली कर्मचारी संगठनों के अनुसार गुरुग्राम क्षेत्र डीएचबीवीएन के कुल राजस्व में करीब 40 प्रतिशत तक योगदान करता है। यदि अधिक भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं का एक हिस्सा निजी वितरण कंपनी के पास चला जाता है तो सरकारी वितरण कंपनी के राजस्व ढांचे पर असर पड़ सकता है।
कर्मचारियों का तर्क है कि सरकारी बिजली वितरण व्यवस्था में औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं से मिलने वाला अपेक्षाकृत अधिक राजस्व कमजोर एवं सब्सिडी वाले उपभोक्ता वर्गों के भार को संतुलित करने में मदद करता है। यदि यह संतुलन बिगड़ा तो भविष्य में ग्रामीण, कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं पर वित्तीय दबाव बढ़ने की आशंका है।
हालांकि, इस आशंका का वास्तविक प्रभाव लाइसेंस की शर्तों, टैरिफ व्यवस्था, उपभोक्ता चयन और कंपनी द्वारा अपने पूर्ण आपूर्ति दायित्व को किस तरह निभाया जाता है, इस पर निर्भर करेगा।
4,716 करोड़ का निजी निवेश बनाम 11,397 करोड़ का सरकारी आकलन
विवाद में निवेश का आंकड़ा भी अहम है। इलेवन पावर ने पांच वर्षों में करीब 4,716 करोड़ रुपये निवेश का प्रस्ताव रखा है। वहीं डीएचबीवीएन ने दोनों जिलों में पूर्ण आपूर्ति दायित्व निभाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे पर करीब 11,397 करोड़ रुपये की जरूरत बताई है। विशेषज्ञ समिति ने दोनों आंकड़ों को अलग-अलग नेटवर्क विकास मॉडल पर आधारित माना है और कंपनी की चरणबद्ध निवेश योजना को स्वीकार किया है। लेकिन बिजली अभियंता संगठन इसी बिंदु पर असहमति जता रहे हैं। उनका सवाल है कि अगर निजी कंपनी का निवेश मुख्य रूप से चरणबद्ध तरीके से होगा तो वह शुरुआत से ही पूरे क्षेत्र के सभी वर्गों के उपभोक्ताओं को समान रूप से बिजली
वितरण की जिम्मेदारी कैसे निभाएगी?
ट्रांसमिशन निगम ने भी जताई आशंका हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम की ओर से भी यह आशंका सामने आई है कि निजी कंपनी शुरुआत में अधिक लाभ वाले उपभोक्ताओं को अपने नेटवर्क से जोड़ने को प्राथमिकता दे सकती है। बताया गया है कि कंपनी ने 220 केवी से 66 केवी उपकेंद्रों के आसपास स्थित औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की योजना बनाई है। कंपनी ने करीब 2.5 प्रतिशत मौजूदा उपभोक्ताओं के उसके नेटवर्क से जुड़ने का अनुमान लगाया है। यदि ऐसा होता है तो संख्या भले ही कम हो, लेकिन राजस्व के लिहाज से इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। दूसरी ओर कृषि और ग्रामीण उपभोक्ताओं का बड़ा हिस्सा सरकारी वितरण कंपनी के पास ही रहने की आशंका है।
बिजली कर्मचारी संगठनों ने आंदोलन की तैयारी तेज की
हरियाणा बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने अब प्रदेशव्यापी राजनीतिक संपर्क अभियान शुरू किया है। मंत्रियों और विधायकों को ज्ञापन देकर संगठन चाहता है कि विधानसभा में सरकार से इस पूरे मामले पर जवाब मांगा जाए। ऑल हरियाणा पावर कॉरपोरेशन वर्कर के महासचिव राजेंद्र राणा के अनुसार संयुक्त संघर्ष मोर्चा की बैठक जल्द बुलाई जाएगी। इसमें बिजली क्षेत्र से जुड़े मौजूदा मुद्दों पर चर्चा के बाद आंदोलन की आगामी रणनीति तय की जाएगी।
यानी मामला केवल ज्ञापन तक सीमित रहने के संकेत नहीं हैं। यदि विधानसभा में मुद्दा उठता है और एचईआरसी की सुनवाई आगे बढ़ती है तो आने वाले दिनों में कर्मचारी संगठनों और सरकार के बीच टकराव और बढ़ सकता है।
संपत सिंह ने भी रिपोर्ट पर उठाए सवाल
इनेलो के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री प्रो. संपत सिंह ने भी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अंतिम निर्णय एचईआरसी को करना है और यदि आयोग का फैसला निजी कंपनी के पक्ष में जाता है तो उसका विरोध किया जाएगा। इससे साफ है कि निजी बिजली वितरण का मुद्दा अब कर्मचारी संगठनों के दायरे से निकलकर राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन रहा है।
असली परीक्षा एचईआरसी के फैसले की
पूरे विवाद का निर्णायक बिंदु अब हरियाणा विद्युत नियामक आयोग के सामने होने वाली प्रक्रिया है। एक तरफ निजी कंपनी निवेश, प्रतिस्पर्धा और वैकल्पिक वितरण व्यवस्था का तर्क दे रही है, तो दूसरी तरफ बिजली कर्मचारी सरकारी वितरण व्यवस्था, ग्रामीण उपभोक्ताओं और क्रॉस-सब्सिडी मॉडल पर संभावित असर को लेकर चिंतित हैं।
इसलिए आने वाले विधानसभा सत्र में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या निजी बिजली वितरण को प्रतिस्पर्धा और निवेश के अवसर के रूप में देखा जाएगा या इसे सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के लिए संभावित चुनौती माना जाएगा। ऊर्जा मंत्री अनिल विज का कर्मचारियों के समर्थन में दिया गया बयान इस बहस को और राजनीतिक वजन दे चुका है। अब निगाहें विधानसभा और एचईआरसी—दोनों पर हैं।