फोन के साथ चार्जर न मिलने से पर्यावरण को फायदा या जेब पर भारी बोझ? जानिए एक्सपर्ट की राय
स्मार्टफोन के डिब्बों से चार्जर गायब होने के पीछे पर्यावरण बचाने की दलील या मार्केट इकोनॉमिक्स? जानिए भारत में बढ़ते ई-वेस्ट और इससे जुड़ी पूरी सच्चाई।
पतली पिन का पुराना चार्जर आज भले ही मीम्स का हिस्सा बन गया हो, लेकिन स्मार्टफोन कंपनियों द्वारा बॉक्स से चार्जर हटाए जाने का यह ट्रेंड अब पर्यावरण के लिए एक गंभीर सवाल बन गया है। जब आप आज नया स्मार्टफोन खरीदते हैं, तो डिब्बे में फोन और डेटा केबल तो मिलती है, लेकिन ट्रैवल अडैप्टर गायब होता है। एप्पल और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां इसके पीछे पर्यावरण बचाने का तर्क देती हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कंपनियों की व्यावसायिक रणनीतियां भी जुड़ी हैं।
💰 चार्जर अलग से खरीदने पर बढ़ती है जेब पर लागत: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक्सपर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
कंपनियों का तर्क है कि घरों में पहले से चार्जर मौजूद होने के कारण हर बार नया एडाप्टर देना जरूरी नहीं है, जिससे पैकेजिंग और ट्रांसपोर्टेशन कम होता है। हालांकि, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) में इंडस्ट्री एंड रिन्यूएबल एनर्जी प्रोग्राम डायरेक्टर निवित कुमार यादव का कहना है कि इसे सिर्फ पर्यावरण बचाने का फैसला नहीं माना जा सकता। अलग से अच्छा चार्जर खरीदने पर ग्राहक को 1,500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, जिससे फोन की असली कीमत बढ़ जाती है और यह कंज्यूमर की जेब पर सीधा असर डालता है।
🗑️ भारत में तेजी से बढ़ रहा ई-वेस्ट का पहाड़: सीपीसीबी के आंकड़े और कंपनियों की जवाबदेही पर बड़ा संकट
यह मुद्दा इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste) लगातार खतरनाक स्तर पर बढ़ रहा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2023-24 में देश में करीब 12.54 लाख टन ई-वेस्ट रजिस्टर्ड हुआ था, जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 13.98 लाख टन (11.5% की बढ़ोतरी) हो गया। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के अनुसार यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली समस्या सिर्फ चार्जर का डिब्बे से गायब होना नहीं है, बल्कि पुराने फोन्स और इलेक्ट्रॉनिक्स का अनौपचारिक सेक्टर में चले जाना और कंपनियों द्वारा टेक-बैक स्कीम को पूरी तरह से लागू न करना है।