भाई-बहन के अटूट प्रेम की मिसाल, किसी ने दी किडनी तो किसी ने लिवर का हिस्सा देकर बचाई जान

रक्षाबंधन के मौके पर कई ऐसे मामले सामने आए जहां बहनों ने भाइयों को किडनी दान की और मामा ने भांजी की जान बचाने के लिए लिवर का हिस्सा दिया।

राखी का धागा सिर्फ एक रेशम की डोर नहीं बल्कि जीवन भर रक्षा करने का वो वादा है जिसे इस बार दो बहनों ने निभाया। जब किडनी की बीमारी के चलते दो भाइयों की सांसें संकट में थीं, तब उनकी बहनों ने अपने जीवन की परवाह किए बिना भाइयों को किडनी दान कर उन्हें नया जीवन दिया। शुक्रवार को भाई-बहन जीवन की नई आशा के साथ रक्षाबंधन मनाएंगे।

उत्तराखंड के किच्छा निवासी 40 साल के जितेंद्र गंगवार पिछले दो सालों से क्रॉनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे थे। भाई की यह तकलीफ देखकर उनकी 45 साल की अविवाहित बहन बीना गंगवार ने अपनी किडनी देने का फैसला किया। जुलाई के अंत में ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में जितेंद्र का सफल किडनी प्रत्यारोपण हुआ। उन्होंने भावुक होकर कहा, यह रक्षाबंधन मेरे लिए सबसे खास है। ऐसी बहन भगवान हर भाई को दे। वहीं, सुप्रियो भी लंबे समय से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। सुप्रियो को बचाने के लिए किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता बचा है तो उनकी बहन सोनाली ने अपनी किडनी देने का फैसला किया।

भाई ने लिवर का हिस्सा दिया

इधर, दिल्ली में भी रक्षाबंधन से पहले भाई-बहन के रिश्ते की एक अनूठी मिसाल सामने आई है। 24 साल के युवक ने अपनी पांच महीने की भांजी की जान बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर दिया। जटिल पीडियाट्रिक लिवर ट्रांसप्लांट सफल रहा और बच्ची को 20 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

सांविका शुक्ला को जन्म के कुछ सप्ताह बाद गंभीर पीलिया हुआ था। इसके बाद उसकी पित्त नलिकाओं में रुकावट पैदा हो गई, जिससे लिवर में गंभीर क्षति पहुंची और उसकी हालत लगातार बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि लिवर ट्रांसप्लांट ही उसकी जान बचाने का एकमात्र विकल्प है। बच्ची के माता-पिता और दादी को मेडिकल जांच के बाद लिवर डोनर के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। ऐसे में बच्ची के मामा सिवेंद्र कुमार पांडे ने अपनी बहन की बेटी की जान बचाने के लिए लिवर का एक हिस्सा दान करने का फैसला किया। फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग में डॉ. आशीष जॉर्ज के नेतृत्व में सफल ट्रांसप्लांट किया गया।

दो भाइयों ने बहन को किडनी देकर जीवन बचाया

दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में दो छोटे भाइयों ने किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपनी बहन को किडनी दान कर नई जिंदगी दी है। दोनों मामलों में लिविंग डोनर किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। मूलचंद किडनी ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के निदेशक एवं यूरोलॉजी के निदेशक डॉ. मनोज अग्रवाल ने बताया कि पीयूष चौधरी ने अपनी 48 वर्षीय बड़ी बहन सारिका चौधरी को किडनी दान की। इसी तरह 31 वर्षीय मोहम्मद आलम ने 40 वर्षीय बहन शीमू चौधरी को किडनी देकर नया जीवन दिया। दोनों मामलों में छोटे भाई अपनी बहन के लिए आगे आए। किडनी ट्रांसप्लांट आधुनिक तकनीक और एआई आधारित सुविधाओं की मदद से किए गए।

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