संविधान सभा में राजभाषा का प्रश्न हिंदी, हिंदुस्तानी और अंग्रेज़ी के प्रश्न पर ऐतिहासिक समझौता

इस दृष्टि से 12, 13 और 14 सितंबर 1949 की बहसें केवल अतीत का दस्तावेज नहीं हैं। वे आज भी यह समझने की कुंजी हैं कि भारत में भाषा कभी केवल भाषा नहीं रही; वह पहचान, संस्कृति, सत्ता, शिक्षा, अवसर और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा प्रश्न भी रही है।

भारत के संविधान-निर्माण के इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें केवल कैलेंडर की तारीखों के रूप में नहीं देखा जा सकता। 12, 13 और 14 सितंबर 1949 ऐसी ही तीन ऐतिहासिक तिथियाँ हैं। इन तीन दिनों में संविधान सभा ने उस प्रश्न पर निर्णायक बहस की, जिसका संबंध केवल सरकारी कामकाज की भाषा से नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की पहचान और प्रशासनिक व्यवस्था से भी था।

प्रश्न था—स्वतंत्र भारत अपने शासन की आवाज किस भाषा में सुनेगा और किस भाषा में बोलेगा? क्या औपनिवेशिक शासन की भाषा रही अंग्रेज़ी स्वतंत्र भारत में भी बनी रहेगी? क्या हिंदी को संघ की राजभाषा बनाया जाएगा? यदि हिंदी को यह स्थान मिलता है तो उसका स्वरूप कैसा होगा—संस्कृतनिष्ठ हिंदी, उर्दू से प्रभावित हिंदुस्तानी अथवा दोनों परंपराओं को समाहित करने वाला कोई व्यापक रूप? क्या देवनागरी लिपि अनिवार्य होगी? अंकों का स्वरूप क्या होगा? न्यायपालिका और कानूनों की भाषा कौन-सी होगी? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि हिंदी को तत्काल लागू किया जाए अथवा अंग्रेज़ी को एक निश्चित संक्रमणकाल तक बनाए रखा जाए।

इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक दिन में नहीं मिला। 12 से 14 सितंबर 1949 तक संविधान सभा में हुई विस्तृत बहस के बाद ही समाधान सामने आया। इसलिए 14 सितंबर को केवल ‘हिंदी दिवस’ के रूप में देखना इस व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया को सीमित कर देना होगा।

भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया में राजभाषा का प्रश्न सबसे अधिक भावनात्मक, राजनीतिक और विवादास्पद विषयों में से एक था। स्वतंत्रता के समय भारत में कोई एक ऐसी भाषा नहीं थी, जिसे पूरे देश की निर्विवाद साझा भाषा कहा जा सके। हिंदी उत्तर और मध्य भारत के विशाल भूभाग में व्यापक रूप से बोली और समझी जाती थी, लेकिन बंगाल, मद्रास, बंबई, असम तथा दक्षिण भारत सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों की अपनी समृद्ध भाषायी परंपराएँ थीं।

दूसरी ओर, लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के कारण अंग्रेज़ी प्रशासन, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और विधायी कार्यों की प्रमुख भाषा बन चुकी थी। इसलिए अंग्रेज़ी को अचानक समाप्त कर देना प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं माना जा रहा था। यही इस पूरे विवाद का मूल द्वंद्व था।

मुंशी–अय्यंगार सूत्र

राजभाषा संबंधी विवाद का समाधान निकालने में के. एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अय्यंगार की भूमिका निर्णायक रही। संविधान सभा की 12 सितंबर 1949 की कार्यवाही इस पूरी कहानी की कुंजी मानी जाती है। व्यापक विचार-विमर्श और विभिन्न पक्षों के बीच सहमति बनाने के प्रयासों के बाद जो समझौता सामने आया, उसे प्रायः ‘मुंशी–अय्यंगार सूत्र’ कहा जाता है।

इस समझौते की मूल भावना थी—

  • संघ की राजभाषा हिंदी होगी।
  • हिंदी की लिपि देवनागरी होगी।
  • संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप अपनाया जाएगा।
  • अंग्रेज़ी का प्रयोग तत्काल समाप्त नहीं किया जाएगा।
  • संविधान लागू होने के बाद 15 वर्षों तक संघ के उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रहेगा, जिनके लिए पहले उसका उपयोग हो रहा था।
  • संसद को कानून बनाकर 15 वर्ष की अवधि के बाद भी अंग्रेज़ी के प्रयोग को जारी रखने का अधिकार होगा।
  • सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा विधायी और कानूनी पाठों में अंग्रेज़ी के प्रयोग की व्यवस्था जारी रहेगी।
  • हिंदी का विकास इस प्रकार किया जाएगा कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

हिंदी के विकास की यही समावेशी दृष्टि आगे चलकर संविधान के अनुच्छेद 351 में दिखाई देती है। इसमें हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए हिंदुस्तानी तथा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूपों, शैलियों और शब्दों को आत्मसात करने की बात कही गई।

राजनीतिक और भावनात्मक बहस

12 सितंबर 1949 को समझौता-प्रस्ताव सामने आने के बाद 13 सितंबर को बहस अधिक राजनीतिक और भावनात्मक हो गई। हिंदी समर्थकों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर था। आर. वी. धुलेकर जैसे सदस्यों को लग रहा था कि लंबे संघर्ष के बाद हिंदी को उसका संवैधानिक स्थान मिलने जा रहा है।

सेठ गोविंद दास का मत था कि प्रस्ताव हिंदी को स्वीकार तो करता है, लेकिन अंग्रेज़ी को लंबे समय तक बनाए रखने का रास्ता भी खुला छोड़ता है। हिंदी समर्थक सदस्यों का एक वर्ग चाहता था कि अंग्रेज़ी पर निर्भरता यथाशीघ्र समाप्त हो और हिंदी को तत्काल शासन की प्रमुख भाषा बनाया जाए।

इसके विपरीत नज़ीरुद्दीन अहमद ने अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि किसी अखिल भारतीय भाषा का निर्धारण केवल संवैधानिक घोषणा के आधार पर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार अंग्रेज़ी तब तक जारी रहनी चाहिए, जब तक कोई ऐसी अखिल भारतीय भाषा विकसित न हो जाए जो शासन, न्याय, विज्ञान, तकनीक और सभी क्षेत्रों के विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में सक्षम हो। उनका मानना था कि किसी भाषा की स्वीकार्यता केवल संविधान सभा के निर्णय से नहीं, बल्कि जनता की स्वैच्छिक स्वीकृति से भी निर्धारित होनी चाहिए।

दक्षिण भारत की ओर से एस. वी. कृष्णमूर्ति राव ने भी महत्वपूर्ण दृष्टिकोण रखा। उनके मतानुसार अय्यंगार का प्रस्ताव एक ऐसा संतुलन प्रस्तुत करता था, जिसमें हिंदी समर्थकों को अपनी भाषा विकसित करने का अवसर मिलता था और गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों को यह आश्वासन भी मिलता था कि उन पर कोई भाषा अचानक नहीं थोपी जाएगी।

हिंदुस्तानी और दोनों लिपियों का प्रस्ताव

14 सितंबर 1949 को बहस अपने चरम पर पहुँची। मोहम्मद इस्माइल ने हिंदुस्तानी के पक्ष में संशोधन प्रस्तुत किया। उनका प्रस्ताव था कि संघ की राजभाषा हिंदुस्तानी हो और उसे देवनागरी तथा उर्दू—दोनों लिपियों में स्वीकार किया जाए।

जी. दुर्गाबाई ने भी भाषा के व्यापक और समावेशी स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया। उनका आशय था कि यदि भारत को जोड़ने वाली भाषा विकसित करनी है तो उसे किसी एक क्षेत्र अथवा सांस्कृतिक परंपरा की सीमाओं में नहीं बाँधा जाना चाहिए। भाषा का प्रश्न सरकारी नौकरियों, शिक्षा और समान अवसरों से भी जुड़ा हुआ था। इसलिए यह आवश्यक था कि भाषा संबंधी व्यवस्था किसी क्षेत्र के नागरिकों के लिए अवसरों के द्वार बंद न करे।

अंकों के स्वरूप पर विवाद

भाषा संबंधी बहस केवल शब्दों और लिपि तक सीमित नहीं थी। अंकों का स्वरूप भी विवाद का प्रमुख विषय था। एक पक्ष देवनागरी अंकों के प्रयोग का समर्थन कर रहा था, जबकि दूसरा पक्ष उस अंक-पद्धति को बनाए रखने के पक्ष में था जिसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रयोग हो रहा था।

अंततः संविधान में संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए ‘भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप’ को स्वीकार किया गया। आज प्रचलित 0, 1, 2, 3 आदि अंक इसी संवैधानिक अभिव्यक्ति के अंतर्गत आते हैं।

राज्यों और संघ के बीच भाषा

प्रस्ताव में संघ की राजभाषा के साथ-साथ राज्यों की भाषाओं का प्रश्न भी शामिल था। संविधान में राज्यों को अपने राजकीय प्रयोजनों के लिए राज्य में प्रचलित किसी एक या अधिक भाषाओं अथवा हिंदी को अपनाने का अधिकार दिया गया।

राज्यों के बीच तथा राज्य और संघ के बीच संचार की भाषा के लिए भी संवैधानिक व्यवस्था की गई। साथ ही यह प्रावधान रखा गया कि यदि दो या अधिक राज्य परस्पर सहमत हों तो वे आपसी पत्राचार के लिए हिंदी का प्रयोग कर सकते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि संविधान सभा केवल संघ की राजभाषा निर्धारित नहीं कर रही थी, बल्कि वह भारत जैसे बहुभाषी संघ के प्रशासन का व्यापक ढाँचा भी तैयार कर रही थी।

न्यायपालिका और कानूनों की भाषा

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही तथा विधेयकों, अधिनियमों, अध्यादेशों, नियमों और विनियमों के प्रामाणिक पाठों के लिए अंग्रेज़ी के प्रयोग को जारी रखा गया। इसका प्रमुख कारण कानूनी भाषा की सटीकता और न्यायिक निरंतरता थी।

कानून की भाषा में किसी एक शब्द का अर्थ भी न्यायिक परिणाम को बदल सकता है। अंग्रेज़ी में निर्मित कानूनों की व्याख्या के लिए न्यायपालिका के पास वर्षों का अनुभव, स्थापित परंपराएँ और न्यायिक दृष्टांत उपलब्ध थे। इसलिए कानूनी और न्यायिक व्यवस्था की भाषा को अचानक बदलना व्यावहारिक तथा सुरक्षित नहीं माना गया।

14 सितंबर का ऐतिहासिक निर्णय

अंततः 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने यह मूल व्यवस्था स्वीकार की—

“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।”

इसके साथ ही संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप को स्वीकार किया गया। अंग्रेज़ी के प्रयोग को तत्काल समाप्त करने के बजाय संविधान लागू होने की तिथि से 15 वर्षों का संक्रमणकाल निर्धारित किया गया। संसद को यह अधिकार भी दिया गया कि वह कानून बनाकर इस अवधि के बाद अंग्रेज़ी के प्रयोग को जारी रखने की व्यवस्था कर सके।

इस प्रकार संविधान सभा ने भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेने का मार्ग खुला रखा।

विजय से अधिक समझौते की कहानी

क्या यह हिंदी की विजय थी? निस्संदेह हिंदी समर्थकों के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। हिंदी को संघ की राजभाषा और देवनागरी को उसकी लिपि के रूप में संवैधानिक मान्यता मिली।

लेकिन इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य भी जुड़े थे—

  • अंग्रेज़ी तत्काल समाप्त नहीं हुई।
  • हिंदुस्तानी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
  • उर्दू लिपि को संघ की आधिकारिक लिपि का दर्जा नहीं मिला।
  • हिंदी के विकास को अन्य भारतीय भाषाओं और भारत की सामासिक संस्कृति से जोड़ा गया।
  • संसद को भविष्य में अंग्रेज़ी के प्रयोग की निरंतरता निर्धारित करने का अधिकार दिया गया।

इसलिए 14 सितंबर की वास्तविक कहानी केवल विजय की नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सहमति और समझौते की कहानी है।

‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘राजभाषा’

इन तीन दिनों की बहस का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि संविधान ने हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ घोषित नहीं किया। अनेक हिंदी समर्थक हिंदी के लिए ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का प्रयोग करते थे, लेकिन संविधान में व्यावहारिक और विधिक शब्द के रूप में ‘राजभाषा’ को स्थान दिया गया।

यह अंतर मामूली नहीं है। ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द सांस्कृतिक अथवा भावनात्मक प्रतिनिधित्व का संकेत दे सकता है, जबकि ‘राजभाषा’ का अर्थ संघ के राजकीय और आधिकारिक कार्यों के लिए निर्धारित भाषा है। इसी संवैधानिक समझ ने भारत की बहुभाषी संरचना और विभिन्न भारतीय भाषाओं की समान गरिमा को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विविधता को साथ लेकर चलने का संकल्प

14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्वीकृति मिली। इसलिए इस दिन को केवल हिंदी की विजय कहना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा। यह वास्तव में तीन आवश्यकताओं के बीच समझौते का दिन था—हिंदी से जुड़ी राष्ट्रीय आकांक्षा, गैर-हिंदी भाषी भारत की आशंकाएँ और प्रशासनिक आवश्यकता के रूप में अंग्रेज़ी की निरंतरता।

इस दृष्टि से 12, 13 और 14 सितंबर 1949 की बहसें केवल अतीत का दस्तावेज नहीं हैं। वे आज भी यह समझने की कुंजी हैं कि भारत में भाषा कभी केवल भाषा नहीं रही; वह पहचान, संस्कृति, सत्ता, शिक्षा, अवसर और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा प्रश्न भी रही है।

संविधान सभा का समाधान किसी एक पक्ष की विजय से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। वह विविधता को सहमति के साथ लेकर चलने का भारतीय लोकतांत्रिक प्रयोग था। संविधान सभा ने हिंदी को चुना, लेकिन भारत की बहुभाषी आत्मा की कीमत पर नहीं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में—

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥

नारद प्रसाद किमोठी ‘नीरस’
संयुक्त निदेशक (सेवानिवृत्त)
लोक सभा सचिवालय
भारत की संसद
मोबाइल नं.: 9999068740

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