हरियाणा के 88 ब्लॉकों में खतरनाक स्तर पर पहुंचा टीडीएस, पलवल और नूंह में हालात सबसे गंभीर

हरियाणा विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के कई ब्लॉकों में भूजल का टीडीएस तय सीमा से अधिक हो गया है, जिससे स्वास्थ्य का संकट गहरा रहा है।

चंडीगढ़ :  हरियाणा में पेयजल संकट अब केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि भूजल की लगातार बिगड़ती गुणवत्ता ने भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है। विधानसभा के मानसून सत्र में सामने आए सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 142 ब्लॉकों में से 88 ब्लॉक ऐसे हैं, जहां भूजल का औसत टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) 500 मिलीग्राम प्रति लीटर की स्वीकार्य सीमा से अधिक है। वहीं 93 ब्लॉकों में वर्ष 2022 की तुलना में 2025 के दौरान भूजल की गुणवत्ता और खराब हुई है। कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला द्वारा पूछे गए अतारांकित सवाल के जवाब में जनस्वास्थ्य मंत्री रणबीर गंगवा ने सदन में सरकार के आंकड़े रखे। इन आंकड़ों ने प्रदेश की पेयजल व्यवस्था, भूजल पर बढ़ती निर्भरता और नहरी पेयजल की सीमित पहुंच को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीन साल में 93 ब्लॉकों का पानी हुआ और खराब

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 से 2025 के बीच 142 में से 93 ब्लॉकों यानी करीब 65.5 प्रतिशत ब्लॉकों में भूजल की गुणवत्ता खराब हुई। इस अवधि में प्रदेश का औसत टीडीएस 658 मिलीग्राम प्रति लीटर से बढ़कर 737 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 1,500 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक टीडीएस वाले ब्लॉकों की संख्या भी बढ़ी है। वर्ष 2022 में ऐसे केवल दो ब्लॉक थे, जबकि 2025 में इनकी संख्या बढ़कर नौ हो गई। वहीं 35 ब्लॉकों में टीडीएस 1,000 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे अधिक दर्ज किया गया।

पलवल और नूंह में हालात गंभीर

भूजल की गुणवत्ता में गिरावट का सबसे गंभीर असर पलवल और नूंह जैसे जिलों में दिखाई दे रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पलवल में औसत टीडीएस 940 से बढ़कर 1,636 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया। इसी तरह नूंह के इंदी ब्लॉक में टीडीएस 1,002 से बढ़कर 1,974 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ पेयजल स्रोतों में टीडीएस 9,553 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया। यह 500 मिलीग्राम प्रति लीटर की स्वीकार्य सीमा से लगभग 19 गुना अधिक है। ऐसे आंकड़े केवल पानी के स्वाद या उपयोगिता का सवाल नहीं हैं, बल्कि लंबे समय तक खराब गुणवत्ता वाले पानी के इस्तेमाल से स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को भी सामने लाते हैं।

पांच जिलों में 13 साल से नहरी पानी की कवरेज शून्य

भूजल की गुणवत्ता बिगड़ने के बावजूद कई जिलों में नहरी पेयजल की पहुंच बेहद सीमित है। आंकड़ों के अनुसार फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, पंचकूला और यमुनानगर में नहरी पानी की कवरेज शून्य बनी हुई है। खास बात यह है कि वर्ष 2014 में भी इन जिलों में नहरी पानी की कवरेज शून्य थी। यानी करीब 13 वर्षों में स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। करनाल में भी नहरी पानी की कवरेज महज करीब 1.90 प्रतिशत है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, वहां वैकल्पिक और सुरक्षित पेयजल स्रोत के रूप में नहरी पानी की उपलब्धता बढ़ाना अहम माना जाता है।

दूषित पेयजल की शिकायतें सात गुना से ज्यादा बढ़ीं

प्रदेश में दूषित पेयजल को लेकर सामने आ रही शिकायतों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2019 में दूषित पेयजल से संबंधित 1,356 शिकायतें दर्ज हुई थीं। वर्ष 2025 में इनकी संख्या बढ़कर 9,769 हो गई। यानी छह वर्षों में शिकायतों में करीब 7.2 गुना वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2026 में भी अब तक 6,676 शिकायतें दर्ज होने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल सरकारी आंकड़ों में दर्ज भूजल गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोगों के स्तर पर भी पेयजल की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें बढ़ रही हैं।

भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने बढ़ाई चुनौती

हरियाणा में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और कृषि गतिविधियों के विस्तार के साथ भूजल पर दबाव लगातार बढ़ा है। दूसरी ओर, कई क्षेत्रों में भूजल का स्तर और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं। ऐसे में खारेपन और अधिक टीडीएस वाले पानी पर निर्भरता ग्रामीण और शहरी दोनों आबादी के लिए चुनौती बनती जा रही है। विशेष रूप से दक्षिण हरियाणा और एनसीआर से जुड़े क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता का सवाल लंबे समय से उठता रहा है। पलवल और नूंह के आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं।

आदित्य सुरजेवाला ने मांगा नहरी पेयजल योजनाओं पर श्वेत पत्र

कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला ने सरकार से वर्ष 2014 से अब तक की नहर आधारित पेयजल योजनाओं पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। उनका कहना है कि हरियाणा नहरों का प्रदेश है और जल स्रोत उपलब्ध होने के बावजूद कई जिलों में नहरी पेयजल की पहुंच नहीं बढ़ पाना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पानी का संकट केवल खारेपन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर लोगों के स्वास्थ्य और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है। उनके अनुसार, जब परिवारों को सुरक्षित पेयजल के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है तो इसका सीधा आर्थिक बोझ भी आम जनता पर पड़ता है।

1,000 टीडीएस से ऊपर वाले स्रोतों की हो विस्तृत जांच

सुरजेवाला ने सरकार से मांग की कि जिन सभी जल स्रोतों में टीडीएस 1,000 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है, उनकी विस्तृत जांच कराई जाए। उन्होंने विशेष रूप से फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और भारी धातुओं की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि केवल औसत आंकड़े जारी करने के बजाय सरकार को स्रोतवार जल गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि लोगों को अपने क्षेत्र के पानी की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सके।

पलवल-नूंह समेत प्रभावित जिलों के लिए समयबद्ध योजना की मांग

कांग्रेस विधायक ने पलवल, नूंह और फरीदाबाद समेत गंभीर रूप से प्रभावित जिलों के लिए समयबद्ध नहरी पेयजल योजनाएं घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि जिन क्षेत्रों में भूजल लगातार खराब हो रहा है, वहां वैकल्पिक पेयजल स्रोत उपलब्ध कराना तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।

विधानसभा में सामने आए आंकड़ों ने हरियाणा के सामने दोहरी चुनौती स्पष्ट कर दी है—एक तरफ भूजल की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है और दूसरी तरफ कई जिलों में नहरी पेयजल की कवरेज वर्षों से नहीं बढ़ी। ऐसे में प्रदेश की पेयजल नीति को केवल नए स्रोत तलाशने के बजाय भूजल संरक्षण, जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी और नहरी पेयजल के विस्तार पर एक साथ केंद्रित करने की जरूरत सामने आ रही है।

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