महाराष्ट्र MLC चुनाव: नीलम गोरे और बच्चू कडू का विरोध, शिंदे सेना में बगावत के सुर

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव से पहले एकनाथ शिंदे की बढ़ी मुश्किलें। नीलम गोरे और बच्चू कडू की उम्मीदवारी पर पार्टी नेताओं ने जताया विरोध। जानें क्या है शिंदे का अगला कदम।

महाराष्ट्र में विधानसभा उपचुनाव के नतीजे 4 मई को आएंगे, उसके बाद तुरंत 12 मई को विधान परिषद की 9 सीटों के लिए चुनाव होना है. बताया जा रहा है कि शिवसेना प्रमुख और सूबे के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र विधान परिषद की उपसभापति नीलम गोरे और बच्चू कडू के नाम पर मुहर लगाई थी, लेकिन पार्टी के कई नेता, पदाधिकारी और मंत्रियों ने इन दोनों नामों का विरोध किया है.

हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में सभी को चौंकाते हुए एकनाथ शिंदे ने पार्टी की प्रवक्ता और पिछड़े समाज से आने वाली प्रो. ज्योति वाघमारे को राज्यसभा भेजकर यह संदेश दिया था कि पार्टी में अब काम करने वालों को ही तवज्जो दी जाएगी.

‘नीलम गोरे की जगह किसी अन्य को टिकट देना चाहिए’

शिंदे की पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ताओं का कहना है कि नीलम गोरे की जगह किसी अन्य कार्यकर्ता को टिकट देना चाहिए. गोरे को इससे पहले पार्टी ने 4 बार विधान परिषद में भेजा है. उनकी उम्र भी 71 साल है और पिछले 24 साल से विधान परिषद में रहकर गोरे ने कभी भी पार्टी को आगे बढ़ाने को लेकर योगदान नहीं दिया.

‘बच्चू कडू को शर्त पर उम्मीदवारी दी जाए’

विधान परिषद की दूसरी सीट के लिए एकनाथ शिंदे की पसंद पूर्व विधायक बच्चू कडू हैं. पिछले दिनों शिंदे ने बच्चू कडू के साथ मुलाकात भी की थी. पार्टी के भीतर बच्चू कडू को लेकर नाराजगी साफ तौर पर दिख रही है. बच्चू कडू और शिवसेना का संबंध क्या है? यह सवाल अब पूछा जा रहा है. शिवसेना के कुछ नेताओं ने एकनाथ शिंदे को बताया कि अगर बच्चू कडू को विधान परिषद में जाना है तो उनकी पार्टी ‘प्रहार जनशक्ति संगठन’ को शिवसेना में विलय करना चाहिए.

नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 30 अप्रैल

एकनाथ शिंदे की शिवसेना के विधानसभा में 57 विधायक हैं. विधान परिषद में जीतने के लिए 28 वोटों का कोटा जरूरी है, इसलिए चुनाव हुआ तो भी ये दोनों सीटें सुरक्षित मानी जा रही हैं. पार्टी के भीतर टिकट की दावेदारी के लिए सैकड़ों लोग खड़े हैं. नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 30 अप्रैल है, और अब एकनाथ शिंदे के पास सिर्फ 2 दिन का समय बचा है. ऐसे में अब ये देखना है कि शिंदे क्या फैसला करते हैं.

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