कुरुक्षेत्र-कैथल में धान पर ‘फिजी वायरस’ का संकट, कृषि विशेषज्ञ से जानें बचाव के सटीक उपाय

हरियाणा के कुरुक्षेत्र व कैथल में धान की फसल पर फिजी वायरस का प्रकोप बढ़ा है। सफेद पीठ वाले तेले पर नियंत्रण और फसल बचाव के लिए एग्रो एक्सपर्ट की सलाह पढ़ें।

कुरुक्षेत्र: हरियाणा में धान की फसल पर एक बार फिर साउथर्न राइस ब्लैक स्ट्रिक ड्वार्फ वायरस, जिसे सामान्य भाषा में फिजी वायरस कहा जाता है.. इसका खतरा बढ़ने लगा है. साल 2022 में पहली बार बड़े स्तर पर सामने आई इस बीमारी पर 2023 और 2024 में जागरूकता के चलते काफी हद तक नियंत्रण पाया गया था, लेकिन 2025 और 2026 में कुरुक्षेत्र, कैथल समेत हरियाणा और पड़ोसी राज्यों के कई क्षेत्रों में इसका प्रभाव दोबारा देखने को मिल रहा है.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते उचित प्रबंधन नहीं किया गया तो यह रोग किसानों की उपज और उत्पादन पर गंभीर असर डाल सकता है. इसके कारण और लक्षण के साथ इससे निजात के उपाय की जानकारी के लिए ईटीवी भारत ने कुरुक्षेत्र की एग्रो विशेषज्ञ डॉ. मनीषा से खास बातचीत की.

तेला कीट बन रहा वायरस फैलने की मुख्य वजह: बातचीत के दौरान डॉ. मनीषा ने कहा कि, “यह एक विषाणु जनित बीमारी है, जो सीधे पौधों में नहीं फैलती. इसका प्रमुख वाहक सफेद पीठ वाला तेला (व्हाइट बैक्ड प्लांट हॉपर) है. यही कीट संक्रमित पौधों का रस चूसने के बाद स्वस्थ पौधों तक वायरस पहुंचाता है. वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि हाइब्रिड, परमल और बासमती किस्मों में इसका प्रकोप अधिक देखने को मिलता है. वहीं 25 जून से पहले की गई अगेती रोपाई और नर्सरी में तेला नियंत्रण की अनदेखी भी इस बीमारी के प्रसार का बड़ा कारण बन रही है.”

इन लक्षणों से करें बीमारी की पहचान: कृषि विशेषज्ञ डॉ. मनीषा के अनुसार, “खेत में इस बीमारी की पहचान अपेक्षाकृत आसान है. संक्रमित पौधे सामान्य पौधों की तुलना में बौने रह जाते हैं और खेत में अलग-अलग स्थानों पर छोटे-छोटे समूहों में दिखाई देते हैं. प्रभावित पौधों की पत्तियां असामान्य रूप से गहरे हरे रंग की हो जाती हैं तथा उनमें नए कल्ले निकलना लगभग बंद हो जाता है. इसके अलावा जड़ों का विकास भी रुक जाता है, जिससे पौधे पानी और पोषक तत्वों का पर्याप्त अवशोषण नहीं कर पाते. ऐसे खेतों में सफेद पीठ वाले तेले के शिशु और वयस्क कीट भी आसानी से देखे जा सकते हैं.”

60 दिन पुरानी फसल में तुरंत करें कीट नियंत्रण: डॉ. मनीषा ने आगे बताया कि, “करीब दो महीने या 60 दिन पुरानी धान की फसल में यदि फिजी वायरस के लक्षण दिखाई दें तो सबसे पहले रोग फैलाने वाले तेला कीट पर नियंत्रण करना जरूरी है. इसके लिए डायनोटीफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी (ओशीन या टोकन) 80 ग्राम प्रति एकड़ अथवा पाइमेट्रोजिन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी (चैस) 120 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया जा सकता है. दवा को कम से कम 200 लीटर पानी में घोलकर पौधों के निचले हिस्से यानी तनों और जड़ों के पास अच्छी तरह छिड़कना चाहिए, क्योंकि तेला कीट अधिकतर वहीं छिपा रहता है.”

संक्रमित पौधों को तुरंत हटाना भी जरूरी: संक्रमित पौधों के लेकर डॉ. मनीषा कहती हैं कि, “यदि खेत में संक्रमित या बौने पौधों की संख्या सीमित है तो उन्हें जड़ सहित उखाड़कर खेत से बाहर ले जाकर मिट्टी में दबा देना चाहिए. इससे तेला कीट संक्रमित पौधों से वायरस लेकर स्वस्थ पौधों तक नहीं पहुंचा पाएगा. शुरुआती अवस्था में यह कदम बीमारी के फैलाव को काफी हद तक रोक सकता है.”

पानी और उर्वरक प्रबंधन पर भी दें ध्यान: डॉ. मनीषा ने कहा कि, “किसानों को सलाह है कि खेत में लगातार पानी भरा न रहने दें और समय-समय पर खेत को सुखाते रहें. अधिक नमी वाले खेतों में तेला कीट तेजी से बढ़ता है. इसके साथ ही यूरिया का अत्यधिक प्रयोग करने से भी बचना चाहिए, क्योंकि अधिक नाइट्रोजन मिलने पर फसल कोमल हो जाती है और कीटों का हमला बढ़ जाता है.”

संक्रमित पौधा ठीक नहीं हो सकता, बचाव ही सबसे बड़ा उपाय: कुरुक्षेत्र की एग्रो विशेषज्ञ डॉ. मनीषा ने कहा, “जिस पौधे में फिजी वायरस का संक्रमण हो चुका है, उसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता. इसलिए सबसे जरूरी है कि सफेद पीठ वाले तेला की समय पर रोकथाम की जाए और संक्रमित पौधों को हटाकर बीमारी को स्वस्थ पौधों तक फैलने से रोका जाए. समय पर कीट प्रबंधन ही इस रोग से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है.”

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