हरियाणा में 3 साल में 546 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट, लोकसभा में सामने आया आंकड़ा
हरियाणा में पिछले 3 वर्षों (2023-2026) में 546.87 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन परियोजनाओं के लिए मंजूर की गई। लोकसभा में अंबाला सांसद वरुण चौधरी के सवाल पर केंद्र सरकार ने यह रिपोर्ट पेश की है।
चंडीगढ़ : हरियाणा पहले ही देश के सबसे कम वन क्षेत्र वाले राज्यों में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद पिछले तीन वर्षों में राज्य की 546.87 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न गैर-वन परियोजनाओं के लिए उपयोग करने की मंजूरी दी गई है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में यह जानकारी अंबाला के सांसद वरुण चौधरी और हिसार के सांसद जयप्रकाश के सवाल के लिखित जवाब में दी। यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 3.53 प्रतिशत हिस्सा ही वन क्षेत्र के रूप में दर्ज है। ऐसे में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि एक अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच हरियाणा में 546.87 हेक्टेयर वन भूमि को वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के तहत गैर-वन कार्यों के लिए स्वीकृति दी गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रस्ताव को वैधानिक प्रक्रिया और विस्तृत जांच के बाद ही मंजूरी दी जाती है।
हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा जैसे राज्य में, जहां वन क्षेत्र पहले से ही बेहद सीमित है, वहां वन भूमि का किसी भी रूप में डायवर्जन गंभीर चिंता का विषय है। राज्य में हरित क्षेत्र बढ़ाने की जरूरत है, जबकि दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि का उपयोग लगातार जारी है।
देशभर के आंकड़ों पर नजर डालें तो इसी अवधि में 71,023.30 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए मंजूरी दी गई। सबसे अधिक वन भूमि मध्य प्रदेश में 19,432.14 हेक्टेयर डायवर्ट हुई। इसके बाद ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ का स्थान रहा। उपयोग के आधार पर सबसे अधिक वन भूमि खनन एवं क्वारी परियोजनाओं के लिए दी गई, जबकि जल-विद्युत, सिंचाई और सड़क निर्माण परियोजनाएं भी प्रमुख श्रेणियों में शामिल रहीं।
उत्तर भारत के राज्यों में राजस्थान 3,553.67 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के साथ सबसे आगे रहा। इसके बाद उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड का स्थान रहा। हरियाणा का आंकड़ा इन राज्यों की तुलना में कम जरूर है, लेकिन प्रदेश में पहले से बेहद कम वन क्षेत्र होने के कारण इसका महत्व कहीं अधिक माना जा रहा है।
लोकसभा में वन क्षेत्र के आकलन की तकनीक को लेकर भी सवाल उठाए गए। केंद्र सरकार ने बताया कि भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) वर्तमान में आईआरएस रिसोर्ससैट श्रृंखला के एलआईएसएस-3 सेंसर से प्राप्त 23.5 मीटर रिजॉल्यूशन वाले उपग्रह आंकड़ों के आधार पर वन क्षेत्र का आकलन करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब अधिक सटीक आकलन के लिए एलआईएसएस-4 जैसी उच्च रिजॉल्यूशन तकनीक अपनाने की जरूरत है।
अंबाला से कांग्रेस सांसद वरुण चौधरी ने कहा कि हरियाणा पहले ही देश के सबसे कम वन क्षेत्र वाले राज्यों में शामिल है। ऐसे में वन भूमि का गैर-वन कार्यों में उपयोग चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर नहीं। चौधरी ने मांग की कि सरकार वन क्षेत्र के अधिक सटीक आकलन और संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करे, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर नीतियां बनाई जा सकें।