SC Landmark Judgment: विवाहित बेटियां पराई नहीं; शादी के आधार पर अधिकारों से वंचित करना असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादी के बाद भी बेटी परिवार की सदस्य रहती है। केवल विवाहित होने के आधार पर महिलाओं को सरकारी योजनाओं और अधिकारों से नहीं रोका जा सकता।

देश की सर्वोच्च अदालत ने विवाहित महिलाओं के अधिकारों और उनके हक में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में समाज और व्यवस्था की सोच को बदलने का काम करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी महिला को सिर्फ इसलिए किसी सरकारी कल्याणकारी योजना या अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह शादीशुदा है. अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि यह धारणा पूरी तरह असंवैधानिक है और संविधान के तहत मिलने वाले समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है.

अदालत ने बेटों और बेटियों के बीच की जाने वाली इस असमानता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब एक बेटा शादी करता है, तब भी वह कानूनी और सामाजिक रूप से परिवार का हिस्सा बना रहता है. ऐसे में सिर्फ शादी की वजह से बेटी को परिवार से अलग मान लेना लैंगिक भेदभाव है. भारत का संविधान इस तरह की किसी भी लिंग आधारित रूढ़िवादिता और पुरानी सोच को पूरी तरह से खारिज करता है.

क्या है कुलसुम निशा का पूरा मामला?

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा की अपील से जुड़ा है. कुलसुम की मां गांव में एक उचित मूल्य की दुकान (राशन दुकान) का संचालन करती थीं, जिनका मार्च 2024 में आकस्मिक निधन हो गया था. कुलसुम निशा विवाहित होने के बावजूद अपनी मां और बहनों के साथ ही रहती थीं और दुकान के कामकाज में हाथ बंटाती थीं. मां की मृत्यु के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया, जिसके बाद कुलसुम ने अनुकंपा के आधार पर उस दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया.

हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन नियमों के तहत “विवाहित बेटी को परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया था.” इसी नियम का हवाला देते हुए उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) और बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुलसुम निशा की याचिका को खारिज कर दिया था. इस फैसले को चुनौती देते हुए कुलसुम ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया सरकार का तर्क

सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि विवाहित महिलाएं आमतौर पर अपने पति के घर चली जाती हैं, जिससे स्थानीय निवास से जुड़े नियमों का पालन नहीं हो पाता. इस तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि हर शादीशुदा बेटी कहीं और ही जाकर रहने लगेगी. इस सामान्य धारणा के आधार पर पूरी महिला आबादी को एक झटके में योजना से बाहर नहीं किया जा सकता.

अदालत ने रेखांकित किया कि अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली सहायता का मुख्य उद्देश्य संकट की घड़ी में पीड़ित परिवार को तुरंत वित्तीय संबल देना है. जब प्रशासनिक अधिकारियों ने खुद यह स्वीकार किया है कि कुलसुम उसी गांव में रह रही हैं, तो उन्हें केवल विवाहित होने के आधार पर उनके अधिकार से दूर नहीं रखा जा सकता.

उत्तर प्रदेश सरकार को 4 हफ्ते का अल्टीमेटम

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पुराने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ा निर्देश दिया है कि वह आगामी 4 सप्ताह के भीतर कुलसुम निशा के पक्ष में उचित मूल्य की दुकान का आवंटन आदेश जारी करे. यह फैसला देश भर में महिलाओं के अधिकारों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

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