ट्रेन में आग की अफवाह पर कूदना आत्मघाती नहीं, हाई कोर्ट ने दिया 8 लाख मुआवजे का आदेश
ट्रेन में आग की अफवाह पर कूदने से हुई मौत पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने 8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
चंडीगढ : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ट्रेन में आग लगने की अफवाह के कारण यदि कोई यात्री घबराकर अपनी जान बचाने के लिए ट्रेन से उतरता या छलांग लगाता है और इसी दौरान दूसरी ट्रेन की चपेट में आकर उसकी मौत हो जाती है, तो इसे आत्मघाती कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने ऐसे हादसे को रेलवे अधिनियम के तहत ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ यानी अप्रत्याशित दुर्घटना माना है।
हाई कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, चंडीगढ़ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मृतक के माता-पिता को मुआवजा देने से इनकार किया गया था। जस्टिस हरकेश मनुजा ने मयंक के माता-पिता मीना और एक अन्य की अपील स्वीकार करते हुए रेलवे को आठ लाख रुपये का वैधानिक मुआवजा छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया है।
आग लगने की अफवाह से मची थी ट्रेन में अफरा-तफरी
मामले के अनुसार मयंक अपने साथियों के साथ औरंगाबाद में जागरण में शामिल होने के बाद सचखंड एक्सप्रेस से करनाल लौट रहा था। उसके पास यात्रा का वैध रेलवे टिकट था। यात्रा के दौरान हरसाना कलां रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन में आग लगने की अफवाह फैल गई। देखते ही देखते डिब्बे में अफरा-तफरी और दहशत का माहौल पैदा हो गया।
आग लगने की आशंका से कई यात्री अपनी जान बचाने के लिए ट्रेन से नीचे उतरने लगे। इसी दौरान मयंक ने भी घबराहट में ट्रेन से छलांग लगा दी। दुर्भाग्य से समानांतर ट्रैक पर आ रही दूसरी ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई।
ट्रिब्यूनल ने यात्री की लापरवाही मानकर खारिज किया था दावा
मयंक के माता-पिता ने रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे के लिए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने यह स्वीकार किया कि मयंक वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था और हादसे के समय वह वास्तविक यात्री था। इसके बावजूद ट्रिब्यूनल ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि ट्रेन से उतरने के बाद मयंक यात्री नहीं रहा और उसका ट्रेन से कूदना स्वयं की लापरवाही तथा आत्मप्रेरित चोट की श्रेणी में आता है। इसके आधार पर 14 नवंबर 2025 को दावा खारिज कर दिया गया।
असाधारण परिस्थितियों में यात्री का दर्जा खत्म नहीं होता
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष को गलत ठहराते हुए कहा कि असाधारण परिस्थितियों में किसी यात्री को बीच रास्ते में ट्रेन से उतरना पड़ जाए तो केवल इस आधार पर उसका यात्री होने का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता। यात्रा का अनुबंध तब तक जारी रहता है जब तक यात्री अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच जाता। अदालत ने कहा कि यदि ट्रेन में आग लगने की आशंका के कारण यात्री को अपनी जान पर खतरा महसूस हो और वह बचने के लिए ट्रेन से छलांग लगा दे, तो उसके इस कदम को आत्मघाती या आत्मविनाशकारी कृत्य नहीं कहा जा सकता। यह परिस्थितियों के दबाव में की गई स्वाभाविक आत्मरक्षा की प्रतिक्रिया हो सकती है।
साधारण लापरवाही मुआवजे से इनकार का आधार नहीं
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए ‘स्ट्रिक्ट लाइबिलिटी’ के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ में रेलवे की जिम्मेदारी तय करने के लिए यात्री की साधारण लापरवाही को अपने आप मुआवजा न देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि रेलवे मुआवजे से बचना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा कि संबंधित घटना रेलवे अधिनियम में निर्धारित वैधानिक अपवादों के अंतर्गत आती है।
सहयात्री की गवाही ने खोली घटना की पूरी तस्वीर
मामले की सुनवाई के दौरान मृतक के सहयात्री की गवाही भी महत्वपूर्ण रही। गवाही से यह सामने आया कि ट्रेन में आग लगने की अफवाह के बाद यात्रियों में भारी दहशत फैल गई थी और कई लोग ट्रेन से उतर गए थे। इस परिस्थिति को देखते हुए अदालत ने माना कि मयंक का ट्रेन से कूदना किसी पूर्व नियोजित आत्मघाती कृत्य का प्रमाण नहीं है।
रेलवे की ओर से भी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका, जिससे यह साबित हो कि मयंक की मौत रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए में निर्धारित किसी वैधानिक अपवाद के कारण मुआवजे से बाहर आती है।
आठ सप्ताह में जमा करनी होगी मुआवजे की राशि
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने मयंक के माता-पिता को आठ लाख रुपये का वैधानिक मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस राशि पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
हाई कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह पूरी राशि आठ सप्ताह के भीतर ट्रिब्यूनल में जमा कराए। फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि असाधारण परिस्थितियों में यात्री द्वारा अपनी जान बचाने के लिए उठाया गया तत्काल कदम महज इस आधार पर आत्मघाती या स्वयं की चोट नहीं माना जा सकता कि उसका परिणाम दुर्भाग्यपूर्ण रहा। अदालत ने रेलवे मुआवजा कानून की उस भावना को भी रेखांकित किया है, जिसके तहत वास्तविक ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ में पीड़ित परिवार को वैधानिक राहत उपलब्ध कराना रेलवे की जिम्मेदारी है।