बैंक खाता फ्रीज: अदालत की सीबीआई को फटकार, ‘मनमाना कदम बहुत कठोर’
दिल्ली अदालत ने बैंक खाते फ्रीज करने के मामले में सीबीआई को फटकार लगाई। कहा- अपराध से संबंध न होने पर खाता फ्रीज करना 'अत्यंत कठोर' और मनमाना कदम है।
दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि किसी अपराध से सीधा संबंध न होने पर भी बैंक खाते पर रोक लगाना ‘बहुत कठोर’ कदम है। इसके साथ ही अदालत ने सीबीआई को कड़ी फटकार लगाते हुए उस व्यक्ति के तीन खातों पर लगाई गई रोक को हटाने का निर्देश दिया, जिसके दामाद पर तीन करोड़ रुपए की रिश्वतखोरी का मामला चल रहा है।
खातों पर रोक की ‘मनमानी’ कार्रवाई के लिए एजेंसी की आलोचना करते हुए अदालत ने कहा कि कथित अपराधों की जांच को सिर्फ इस आधार पर आम नागरिकों को परेशान करने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता कि उनके रिश्तेदारों पर कुछ अपराध करने का संदेह है।
कोर्ट ने लगाई सीबीआई को कड़ी फटकार
अदालत ने आगे कहा, ‘जिन व्यक्तियों का अपराध से प्रत्यक्ष या दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है, उनके बैंक खातों पर रोक लगाने के अधिकार का इस तरह मनमाने ढंग से इस्तेमाल पूरी तरह कठोर कार्रवाई है। जांच एजेंसी अपनी मर्जी से किसी भी व्यक्ति के बैंक खाते या अन्य मूल्यवान संपत्तियों को मनमाने तरीके से कुर्क या जब्त नहीं कर सकती।’ इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता के तीनों बैंक खातों पर लगी रोक को हटाने का निर्देश दिया।
तीन बैंक खातों को फ्रीज करने को अवैध बताया
विशेष न्यायाधीश सुशांत चंगोत्रा की अदालत में याचिकाकर्ता गुलशन कुमार की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसे उनके अधिवक्ता प्रतीक सोम ने दायर किया था। याचिका में उनके तीन बैंक खातों पर लगाई गई रोक की कार्रवाई को अवैध बताया गया। अदालत ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा, ‘मौजूदा याचिका में, याचिकाकर्ता (गुलशन) आरोपियों में से एक के ससुर हैं।’
‘ससुर का कहीं से लेकर कहीं तक शामिल नहीं था’
आदेश में कहा गया कि सीबीआई के अनुसार, रिश्वत की रकम की मांग, उसे स्वीकार करने या उसे पहुंचाने से जुड़े घटनाक्रम में याचिकाकर्ता शामिल नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने बैंक खातों पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कारण भी रिकॉर्ड पर दर्ज नहीं किया।
गिरफ्तारी के बाद याचिकाकर्ता के बैंक खातों पर हुई कार्रवाई
वहीं, सीबीआई का आरोप था कि याचिकाकर्ता ने अपने फरार दामाद को छिपाने में मदद की। हालांकि, अदालत ने इस दलील में विसंगति बताते हुए कहा कि जब आरोपी को 16 जून को ही गिरफ्तार कर लिया गया, तो गुलशन कुमार के बैंक खातों पर दो दिन बाद रोक लगाने का औचित्य स्पष्ट नहीं है।
विशेष न्यायाधीश ने कहा, ‘जांच एजेंसी किसी व्यक्ति के बैंक खाते पर रोक लगा सकती है, लेकिन ऐसा केवल अपराध से अर्जित आय को सुरक्षित रखने और उसके नष्ट या गायब होने से रोकने के उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।’
उन्होंने कहा कि मौजूदा मामले में प्रथम दृष्टया अपराध से अर्जित धन और याचिकाकर्ता के बैंक खातों के बीच कोई संबंध दिखाई नहीं देता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आरोपी प्रभात कुमार (कपूर) ने 14 मई को हुई कथित साजिश संबंधी बैठक के बाद अपने ससुर के खाते में कोई राशि भेजी हो।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते पर रोक लगाने से पहले जांच अधिकारी के पास यह मानने का उचित आधार होना चाहिए कि उस खाते का इस्तेमाल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपराध से अर्जित धन प्राप्त करने या उसे विभिन्न लेन-देन के जरिए छिपाने के लिए किया गया। अदालत ने कहा कि इस मामले में सीबीआई ने बैंक खातों पर रोक लगाने का ‘मनमाना फैसला’ करने से पहले संबंधित खातों का विवरण तक हासिल नहीं किया था।