ईरान में मुहर्रम और आशूरा: इमाम हुसैन की शहादत पर उमड़ा जनसैलाब

ईरान में मुहर्रम और आशूरा का मातम। लाखों लोग इमाम हुसैन की शहादत और हालिया युद्ध में मारे गए शहीदों को याद कर हुए भावुक। पढ़ें मुहर्रम की अहमियत।

ईरान में इस साल मुहर्रम और आशूरा का मातम पहले से ज्यादा भावुक माहौल में मनाया गया. लाखों लोगों ने काले कपड़े पहनकर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया. इस बार का मुहर्रम खास इसलिए भी रहा, क्योंकि यह 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-इजराइल के हमलों के बाद पहला मुहर्रम था. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, कई बड़े सैन्य अधिकारी और हजारों आम नागरिक मारे गए थे. इसलिए इस बार लोगों ने कर्बला के शहीदों के साथ-साथ हालिया युद्ध में जान गंवाने वालों को भी याद किया.

ईरान में इस साल मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा गुरुवार को मनाई गई. देशभर के शहरों और गांवों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे. लोगों ने सीना पीटकर मातम किया, नौहे (शोक गीत) सुने और इमाम हुसैन की शहादत पर आंसू बहाए. हर तरफ मातमी जुलूस निकले और या हुसैन की आवाजें गूंजती रहीं.

शिया मुस्लिमों के लिए आशूरा की अहमियत

आशूरा का दिन 680 ईस्वी में हुई कर्बला की जंग की याद में मनाया जाता है. इसी दिन पैगंबर मोहम्मद के नवासे और शिया मुसलमानों के तीसरे इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ शहीद हुए थे. उन्होंने उमय्यद शासक यजीद प्रथम की हजारों सैनिकों वाली सेना के सामने अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी जान कुर्बान कर दी. इसलिए इमाम हुसैन की शहादत को आज भी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है.

मुहर्रम के दौरान पूरे ईरान में लोगों ने ‘नज़री’ यानी मुफ्त भोजन बांटा. यह भोजन मातम करने वालों और जरूरतमंद लोगों को दिया गया. इसे इमाम हुसैन की इंसानियत, सेवा और उदारता की सीख का प्रतीक माना जाता है.

एक दिन पहले तासुआ मनाया गया

आशूरा से एक दिन पहले तासुआ मनाया गया. इस दिन इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास को याद किया गया. वे कर्बला में प्यासे बच्चों और महिलाओं के लिए पानी लाने की कोशिश करते हुए शहीद हो गए थे. ईरान के अलावा दुनिया भर के शिया मुसलमानों ने भी मातमी कार्यक्रम किए. वहीं ईरान और कई दूसरे देशों से लाखों जायरीन इराक के पवित्र शहर कर्बला पहुंचे, जहां इमाम हुसैन की दरगाह पर श्रद्धांजलि दी गई.

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