अमेरिका-ईरान शांति वार्ता: क्या 60 दिन में खत्म होगा दशकों पुराना तनाव?

अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में शांति वार्ता शुरू। 60 दिन में परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों पर समझौते की उम्मीद। जानें क्या हैं समझौते के मुख्य बिंदु।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने और स्थायी शांति समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ती दिख रही है. अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची स्विट्जरलैंड में होने वाली वार्ता के लिए रवाना हो रहे हैं. यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब लेबनान में इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम लागू हो गया है.

इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच बढ़ती लड़ाई ने कुछ समय के लिए अमेरिका-ईरान वार्ता पर सवाल खड़े कर दिए थे. लेकिन शुक्रवार को युद्धविराम लागू होने के बाद बातचीत का रास्ता फिर खुल गया है. माना जा रहा है कि अब दोनों देश अंतरिम समझौते को स्थायी शांति समझौते में बदलने की कोशिश करेंगे.

60 दिन में अंतिम समझौते की कोशिश

इस हफ्तते अमेरिका और ईरान ने 14 पॉइंट्स वाले MoU पर साइन किए थे. इस समझौते के तहत दोनों देशों को 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अन्य विवादित मुद्दों पर अंतिम समझौते तक पहुंचने की कोशिश करनी है.

पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को भी स्विट्जरलैंड जाना था, लेकिन लेबनान में बढ़ते तनाव के कारण उन्होंने अपना दौरा रद्द कर दिया. इसके बाद व्हाइट हाउस ने बताया था कि तकनीकी वार्ता की तारीख और कार्यक्रम अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं. अब युद्धविराम लागू होने के बाद अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ स्विट्जरलैंड जा रहे हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर पहले से वहां मौजूद हैं. ईरानी विदेश मंत्री अराघची शनिवार को वहां पहुंचेंगे.

किन मुद्दों पर होगी बात?

स्विट्जरलैंड में होने वाली वार्ता में कई मुद्दों पर चर्चा होगी. इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, लेबनान में संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय शामिल हैं. समझौते के तहत ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, अरबों डॉलर की जमी हुई संपत्तियों तक पहुंच, तेल निर्यात की छूट और 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं. होर्मुज स्ट्रेट से तेल सप्लाई भी फिर से बढ़ने लगी है. ईरान ने कहा है कि 60 दिन तक वह जहाजों पर कोई टोल नहीं लगाएगा.

इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते का बचाव करते हुए कहा कि ईरान युद्ध से कमजोर हुआ है और अमेरिका ने किसी दबाव में आकर यह समझौता नहीं किया. अब दुनिया की नजर अगले 60 दिनों की बातचीत पर है, जिससे तय होगा कि यह अस्थायी समझौता स्थायी शांति में बदल पाता है या नहीं.

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