विशेष बच्चों के व्यवहार में बदलाव जिद नहीं, मनोवैज्ञानिक कंचन मेहता से जानें सही तरीका
विशेष बच्चों के अचानक बदलते व्यवहार को जिद न समझें। मनोवैज्ञानिक कंचन मेहता से जानें उनके मन को समझने के उपाय।
चंडीगढ़ : विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के व्यवहार में अचानक होने वाले बदलाव को माता-पिता और शिक्षकों को गंभीरता से समझने की जरूरत है। कई बार शांत रहने वाला बच्चा अचानक गुस्सा करने लगता है, छोटी-छोटी बातों पर रोता है, चीजें फेंकता है, किसी काम के लिए बार-बार मना करता है या खुद को दूसरों से अलग कर लेता है। ऐसे व्यवहार को केवल जिद या अनुशासनहीनता मान लेना उचित नहीं है। प्रसिद्ध काउंसलर एवं मनोविज्ञान विशेषज्ञ कंचन मेहता के अनुसार, कई बार बच्चे का व्यवहार उसके मन की वह भाषा होता है, जिसे वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता।
व्यवहार के पीछे छिपी परेशानी को पहचानना जरूरी
कंचन मेहता का कहना है कि विशेष बच्चों की भावनाओं और जरूरतों को व्यक्त करने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है। बच्चा किसी आवाज से परेशान हो सकता है, उसे किसी परिस्थिति से डर लग सकता है, दिनचर्या में बदलाव उसे असहज कर सकता है या वह भावनात्मक रूप से आहत हो सकता है। जब वह अपनी परेशानी बता नहीं पाता तो उसका व्यवहार ही उसकी अभिव्यक्ति बन जाता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई बच्चा अचानक स्कूल जाने से मना करने लगे तो तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वह पढ़ाई से बचना चाहता है। स्कूल का वातावरण, किसी व्यक्ति से असहज अनुभव, किसी गतिविधि में कठिनाई या किसी घटना का डर इसके पीछे कारण हो सकता है।
बदलाव कब और क्यों आया, इस पर दें ध्यान
माता-पिता और शिक्षकों को बच्चे के व्यवहार का निरीक्षण करना चाहिए। यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि बदलाव कब शुरू हुआ, उससे ठीक पहले क्या हुआ था और क्या किसी खास व्यक्ति, स्थान या परिस्थिति में बच्चा अधिक परेशान होता है। नींद की कमी, भूख, थकान, अत्यधिक शोर, भीड़ या दिनचर्या में बदलाव भी चिड़चिड़ेपन और बेचैनी का कारण बन सकते हैं।
गुस्से के समय अनुशासन नहीं, सुरक्षा और शांति जरूरी
कंचन मेहता के अनुसार, जब बच्चा अत्यधिक गुस्से या बेचैनी में हो, तब उसे लंबा भाषण देना, बार-बार सवाल पूछना या तत्काल अनुशासन में लाने की कोशिश स्थिति को और बिगाड़ सकती है। ऐसे समय पहले बच्चे को शांत और सुरक्षित वातावरण देना चाहिए। बच्चे के शांत होने के बाद उसकी समझ के अनुसार सरल शब्दों, चित्रों या संकेतों के माध्यम से संवाद किया जा सकता है। अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहन दें। उन्होंने कहा कि जब बच्चा अपनी बात शांत तरीके से कहे, सहायता मांगे या अपनी भावना व्यक्त करने का प्रयास करे तो उसकी प्रशंसा और प्रोत्साहन जरूरी है। इससे धीरे-धीरे वह सीखता है कि अपनी परेशानी बताने के लिए गुस्सा या आक्रामक व्यवहार ही एकमात्र माध्यम नहीं है।
लंबे समय तक बदलाव रहे तो विशेषज्ञ से लें सलाह
कंचन मेहता ने कहा कि यदि बच्चे के व्यवहार में अचानक और गंभीर बदलाव आए, लंबे समय तक बना रहे अथवा उसकी पढ़ाई, दिनचर्या और सामाजिक जीवन पर असर डालने लगे तो विशेषज्ञ से मार्गदर्शन लेना चाहिए। हर बदलता व्यवहार जिद नहीं होता। कई बार वह बच्चे का मौन संदेश होता है—“मुझे डांटिए नहीं, पहले समझिए कि मैं क्या कहना चाहता हूं।” उन्होंने कहा कि विशेष बच्चों को समझने की शुरुआत प्रतिक्रिया देने से पहले उनके व्यवहार के पीछे छिपी भावना को पहचानने से होती है। धैर्य, संवेदनशीलता, स्वीकार्यता और सही संवाद ही उनके मन तक पहुंचने का सबसे मजबूत रास्ता है।